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Ilachandra joshi

1903 - 1982 | اتراکھنڈ

کی

तुम उसी सनातन पुरुष-समाज के नवीन प्रतिनिधि हो जिसने युगों से नारी को छल से ठगकर, बल से दबाकर विनय से बहकाकर और करुणा से गलाकर उसे हाड़माँस की बनी निर्जीव पुतली का रूप देने में कोई बात उठा नहीं रखी है।

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कोई भी दुःखी आदमी घृणा के योग्य नहीं हो सकता।

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मरणजयी जीवन के यथार्थ रूप को पाने के कारण ही आज मानवता दिशा भ्रमित है। अपने जीवन काल की सीमित अवधि को ही चरम अवधि मान लेने की भ्रांति आज चारों ओर संघर्ष, विरोध, विद्रोह और विक्षोभ फैला रखा है। प्रत्येक दिन की मृत्यु प्रत्येक संध्या में होती है और प्रत्येक काली रात की मृत्यु नए अरुणोदय में होती रहती है। यह अटूट कम ही तो महाजीवन है।

जीवन की परिस्थितियों का क्रूर यथार्थ मनुष्य के सहज स्वभाव को कैसे उलटे-सीधे घुमावों से मोड़ता है और आत्म-रक्षा की कैसी-कैसी विचित्र व्यावहारिक कलाएँ सिखाता रहता है, इस बात पर विचार करने पर कभी-कभी आश्वर्य होने लगता है।

भारतीय नारी चाहे समाज के किसी भी स्तर में, किसी भी स्थिति में जीवन क्यों बिताती हो, उसकी आत्मा अपनी मूलगत महानता का त्याग कभी नहीं करती।

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क्षण का अनुभव अनंत में और अनंत का अनुभव क्षण में कराने वाली वह वैयक्तिक चेतना ही मूल जीवन-धारा की एक मात्र उपलब्धि और सार्थकता है।

बाह्य और अंतः स्थित, सभी प्रकार के जीवन-चक्रों की मूल परिचालिका शक्ति है—विश्व-मानव की सामूहिक अज्ञात चेतना।

समाज में प्रतिदिन जो अपराधों और दुष्कर्मों की संख्याएँ बढ़ती चली जा रहीं हैं, उसका प्रधान कारण आज के युग की यही सहानुभूतिरहित, संवेदनाशून्य प्रवृत्तियाँ, विषम सामाजिक परिस्थितियाँ और सामूहिक भ्रष्टाचार ही है।

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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