अपना प्रेम बताने की कोशिश कभी मत करो
apna prem batane ki koshish kabhi mat karo
जॉन एशबेरी
John Ashbery

अपना प्रेम बताने की कोशिश कभी मत करो
apna prem batane ki koshish kabhi mat karo
John Ashbery
जॉन एशबेरी
और अधिकजॉन एशबेरी
बहुत से रंग तुम्हें ले जाएँगे अपने में
लेकिन अब मैं चाहता हूँ कोई बताए किस तरह जाऊँ घर।
पीछे छूटी राह में है रंगबिरंगी और एक छलनी
छायादार जगह। वह वहाँ की है जहाँ वह जा रही है
वहाँ की नहीं जहाँ वह है। फूल अब बोलते नहीं इदा से।
सिर्फ़ फूलों की भाषा बोलते हैं वे
कुछ इस तरह कहते हुए, वहाँ पहुँचने कितनी कठिन कोशिश की मैंने।
यही इसका अर्थ होना चाहिए मैं यहाँ अब तक नहीं हूँ। लेकिन तुम,
तुम दीखते हो इस क़दर औपचारिक, इस क़दर गंभीर। तुम पढ़ नहीं सकते कविता
न वह तरीक़ा जिससे वे सिखाते थे हमें पहले स्कूल में।
मर्म पर लौटना तब ख़ास बात होती थी हमेशा।
कभी भी क्या हम छोड़ सके इसे? मुझे नहीं लगता। यह था हमारा उत्तरी ध्रुव।
हम छुपे रहे और भूखे बने रहे बरसों, और अब
स्तब्ध कीड़ों की तरह छूकर गुज़रते हुए उजली हवाओं को,
तुम फिर वापस हो रास्ते पर, राह जो बढ़ती है
उत्साह से ऊँचाइयों की ओर, पार करती साफ़ और समझदार अंतराल।
वे अब नहीं गढ़ते आश्रय हमारी तरह।
और थामे हुए वह तंतु जो जाले-सा महीन लेकिन मज़बूत है किस क़दर
हममें से हर एक बढ़ता चला जाता है अपनी ही भूल-भुलैया में।
अदृश्यता का उपहार
देवताओं के अलावा सभी को हासिल, इसीलिए हम कहते हैं ये बातें,
भरते हुए रास्तों को रंगों से चेहरों से,
मधुर उच्चारों से, जब तक वे हमें सत्य में झोंक नहीं देते।
- पुस्तक : पुनर्वसु (पृष्ठ 185)
- संपादक : अशोक वाजपेयी
- रचनाकार : जॉन एशबेरी
- प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
- संस्करण : 1989
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