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Periyar E. V. Ramasamy

1879 - 1973

کی

باعتبار

प्रेम मनुष्यता के लिए नैसर्गिक उपहार है।

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महानतम लक्ष्य, जो मेरे जीवन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—वह है शूद्रों को बनियों और ब्राह्मणों के चंगुल से मुक्त कराना।

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यदि कोई व्यक्ति प्रेमियों की मनःस्थिति का सूक्ष्म निरीक्षण करे; तो यह समझ जाएगा कि प्रेम की उत्पत्ति के मूल में मनुष्य की निजी इच्छाएँ, और व्यक्तिगत संतुष्टि की खोज की भावना अंतनिर्हित होती है।

'पतिव्रता' शब्द स्पष्ट रूप से स्त्री-पराधीनता की स्थिति को दर्शाता है। केवल इसलिए कि इसका अभिप्राय ऐसी पत्नी से है जो, 'अपने पति को भगवान का दर्जा देती है; पति की दासी बनकर रहने को ही जो अपना 'संकल्प' (व्रत) मान लेती है, और अपने पति के अलावा वह किसी अन्य पुरुष का विचार तक नहीं रखती।' इसलिए भी कि 'पति' शब्द का आशय ही स्वामी, रहनुमा और सर्वेसर्वा से है।

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जब तक दुनिया में 'मर्दानगी' का बोध क़ायम है, स्त्रियों की पराधीनता बढ़ती ही जाएगी।

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धर्म का आधार अंधविश्वास है। विज्ञान में धर्मों का कोई स्थान नहीं है, इसलिए बुद्धिवाद धर्म से भिन्न है।

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यदि स्त्रियों को सच्ची आज़ादी प्राप्त करनी है; तो उन्हें देव-भक्ति की अवधारणा को समाप्त करना होगा, जो तथाकथित 'मर्दानगी' और 'स्त्रीत्व' को ईश्वर-निर्मित होने का दर्जा देती है।

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स्त्रियों के लिए वास्तविक स्वतंत्रता केवल उसी अवस्था में संभव है; जब उनके पास वह सब कुछ हो, जो पुरुष के पास है।

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अधिकांश लोग; जो स्त्री-स्वाधीनता एवं स्त्री-मुक्ति की बात करते हैं, अपने घरों में स्त्रियों को पर्दे के भीतर रखते हैं।

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उन अनेक कारणों में—जिन्होंने स्त्री को ग़ुलाम बनाने का काम किया है—उसे संपत्ति अधिकार से वंचित कर देना सबसे बड़ा कारण है।

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स्त्रियों को यह हरगिज़ नहीं भूलना चाहिए कि पूरी दुनिया में 'मर्दानगी' (पुरुषत्व) शब्द का उपयोग, स्त्रियों को नीचा दिखाने के अंदाज़ में किया जाता है।

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धर्म एवं ईश्वर के नाम पर मूर्खतापूर्ण आचरण, एक सनातन प्रवृत्ति है।

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निर्दयी धर्म और क़ानून—जो शुचिता/पतिव्रत धर्म के नाम पर स्त्रियों को पति की पशुवत हरकतों को भी सहते जाने का आदेश देते हैं—उन्हें नष्ट हो जाना चाहिए।

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पुरुषों द्वारा स्त्रियों के सम्मान का दिखावा तथा उनकी मुक्ति की दिशा में काम करना, कुछ और होकर महज़ स्त्रियों को छलने का षडयंत्र है।

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बलात विवाह—जिसमें बिना किसी प्रेम-भाव के, सिर्फ़ शुचिता की रक्षा के नाम पर लोगों को एक-दूसरे के साथ दामंत्य जीवन में बाँध दिया जाता है—का तुरंत नाश हो जाना चाहिए।

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गर्भावस्था स्त्री-स्वातंत्रय की क्रूर वैरी है।

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पितृसत्तात्मकता ही एकमात्र कारण है; जिससे ऐसे शब्द—जो दिखाएँ कि शुचिता पुरुष के लिए भी उतनी ही अभीष्ट है—हमारी भाषाओं से ग़ायब कर दिए गए हैं।

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