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Bachchan Singh

1919 - 2008 | جون پور, اتر پردیش

کی

मैं ख़रीद बैठा पीड़ा को यौवन के चिरसंचित धन से!

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तेरे दुःख से कहीं कठिन दुःख यह जग मौन सहा करता है।

सह सकेगी भार कितना यह नयन की नाव!

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मैंने पीड़ा को रूप दिया, जग समझा मैंने कविता की।

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छोटे से जीवन से की है तूने बड़ी-बड़ी प्रत्याशा।

मिल पाया प्यार जिनको आज उनको प्यार मेरा।

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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