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बेरोज़गारी पर कविताएँ

बेकारी या बेरोज़गारी

आधुनिक राज-समाज की एक प्रमुख समस्या है। अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस संकट की अभिव्यक्ति विभिन्न कवियों द्वारा की गई है। प्रस्तुत चयन में ऐसी ही कविताओं का संकलन किया गया है।

हमने यह देखा

रघुवीर सहाय

1908 के दिन

सी. पी. कवाफ़ी

चाकरी में स्वप्न पाले कौन

कृष्ण मुरारी पहारिया

नौकरी

प्रयाग शुक्ल

जिल्दसाज़

विनय सौरभ

बेकारी

बी. गोपाल रेड्डी

हो-हो करता हुआ

प्रदीप सैनी

कटे हाथ

अशोक चक्रधर

उल्लू हौ

रफ़ीक़ शादानी

सरूली

महेश चंद्र पुनेठा

जीवन का दृश्य

अमर दलपुरा

का बतलाई

भारतेंदु मिश्र

सौदागर

भारतेंदु मिश्र

धंधा जनकल्यान

मोहनलाल यादव

लरिकउन ए० मे० पास किहिनि

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

कि

कुमार अम्बुज

कुछ बेरोज़गार लड़के

वंदना मिश्रा

बैचलर

सुमित मिश्र गुंजन

फ़िलहाल मेरे पास

विमलेश त्रिपाठी

बेरोज़गारी

कुमार अनुपम

मैं प्रेम में

पंकज विश्वजीत

नौकरी

मिथिलेश श्रीवास्तव

बेकारी के दिनों में

प्रदीप जिलवाने

अनवांटेड

निशांत

बेरोज़गारी में

प्रांजल धर

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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