बाहर का दीया चट जलता है तो पट बुझता भी है। भीतर का दीया देर से जलता है तो आसानी से बुझता भी नहीं। उसका उजाला देर तक रहता है और दूर तक फैलता है।
आत्मशुद्धि सबसे पहली चीज़ है, वह सेवा की अनिवार्य शर्त है।
प्रार्थना उपवास बिना नहीं होती, और उपवास यदि प्रार्थना का अभिन्न अंग न हो तो वह शरीर की मात्र यंत्रणा है, जिससे किसी का कुछ लाभ नहीं होता। ऐसा उपवास तीव्र आध्यात्मिक प्रयास है, एक आध्यात्मिक संघर्ष है। वह प्रायश्चित और शुद्धिकरण की प्रक्रिया है।
पाप और पुण्य मात्र कृत्य ही नहीं हैं। वस्तुतः तो वे हमारे अंतःकरण के सोये होने या जागे होने की सूचनाएँ हैं।
आत्मशुद्धि के बिना अहिंसा-धर्म का पालन थोथा स्वप्न ही रहेगा।
भावमुखी रहने की चेष्टा करो, पतित नहीं होंगे बल्कि अग्रसर होते रहोगे। गुरुमुखी होने की चेष्टा करो, मन का अनुसरण नहीं करो—उन्नति तुम्हें किसी भी तरह त्याग नहीं करेगी।
सच्ची रोशनी भीतर से पैदा होती है।
जिसके संकल्प मज़बूत नहीं है, जो प्रमादी और मिथ्याचारी हैं, उसे आत्मदर्शन नहीं हो सकता।
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जब तेरे हृदय से अहंकार निकल गया, उस समय वह अंदर आ जाएगा। तुझ पर उसका प्रकाश स्वयं प्रकट हो जाएगा।
स्वयं के भीतर एक मौलिक परिवर्तन को जन्म देना जीवन भर का काम है—यह ऐसी चीज़ नहीं है जो सिर्फ़ कुछ दिनों के लिए है और बाद में इसे भूल जाना है।
जहाँ से ज़ख़्म मिला हो, वहाँ से किनारा किए बिना ज़ख़्म कभी भरेगा नहीं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere