किसी एक लक्ष्य पर एकाग्र होने से अगर वह बौद्धिक क़िस्म का नहीं है, तो माइंड (सेरिब्रल) की क्रिया (फंक्शनिंग) का बैलेंस ख़त्म हो जाता है और फलस्वरूप एक हिस्टीरिया अवस्था प्राप्त होती है। और आदमी अपने विश्वासों और सुझावों की मनचाही आकृति ही नहीं देखता है; बल्कि अवचेतन में व्याप्त विभिन्न भावनाओं द्वारा जनित, उसे मतिभ्रम (हैल्यूसिनेशन) भी होने शुरू हो जाते हैं।
रचनात्मकता का मनोविज्ञान समय के साथ भी एक ख़ास तरह का रिश्ता है—अपने समय के साथ, अपने से पहले समय के साथ और आनेवाले समय के साथ।
मेरा मनोविज्ञान सभी का है।
वास्तव में धार्मिक अनुभवों में मनोविज्ञान की दास्तान बहुत पुरानी है। यह दास्तान तमाम पौराणिक साहित्य और मशहूर संत महात्माओं की जीवनियों से भरी पड़ी है।
मन को बाहरी विषय पर स्थिर करना अपेक्षाकृत सहज है। मन स्वभावतः बहिर्मुखी है, किंतु धर्म, मनोविज्ञान, अथवा दर्शन के विषय में ऐसा नहीं है।
मनोविश्लेषण में एक भी विचार गौण नहीं है, उन विचारों के नगण्य होने का दिखावा इसलिए किया जाता है ताकि उन्हें बताया न जाए।
कलाकार अंतर में उत्थित उन तत्त्वों को ही प्रधानता देता है, जो उसे महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते है। यह महत्त्व-भावना केवल सब्जैक्टिव नहीं है, यह महत्त्व-भावना उस वर्ग की मनोवैज्ञानिक स्थिति के आधार पर खड़ी हुई मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुसार बनती है।
मनुष्य की मानसिक मनोवैज्ञानिक स्वार्थ-बुद्धि, ऊँचे आदर्शों को आगे करके उनके झंडे के नीचे काम करती है।
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मनोवैज्ञानिक अध्ययन की दृष्टि से जेल को अत्यंत उपयुक्त परीक्षण-शाला कह सकते है। वहाँ कोई व्यक्ति देर तक मुँह पर नक़ाब नहीं रख सकता। जल्दी या देर में उसका असली रूप प्रकट हो ही जाता है जेल में मनुष्य के आंतरिक गुण और अवगुण सात परदों को फाड़कर बाहर निकल आते हैं।
सवाल उठता है कि यह कौन तय करेगा कि सामान्य क्या है? सरकार ? समाज? क़ानून? मनोविश्लेषक? या हमें मानना होगा कि असामान्य और सामान्य को अलग करने वाला फ़ासला, बहुत धूमिल और लचीला है। यह सवाल साहित्य को जितना आड़े लेता है उतना ही मनोविज्ञान के सिद्धाँतों को।
अगर बलात्कार को सती-च्युत होना न मान कर हिंसा माना जाए तो अन्य हिंसा के शिकार की तरह, बलात्कृत स्त्री में आक्रोश या रोष तो होगा पर अपराधबोध नहीं। हालाँकि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से पड़ताल करने पर हमें मानना पड़ता है कि, बलात्कार की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि उस पर कोई एकांगी तर्क लागू नहीं किया जा सकता।
वाल्मीकि ने समूह के मनोविज्ञान के संदर्भ में, समूह के भीतर तथा समूह के पृथक—इन दोनों स्तरों पर व्यक्ति की मनोदशाओं का बहुत बारीकी से उद्घाटन किया है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere