मीडिया पर बेला
मीडिया का सामान्य अर्थ
संचार-माध्यम है। समकालीन संवाद में यह मुख्यतः न्यूज़ मीडिया और सोशल मीडिया को सूचित करता है। मीडिया को लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में देखा जाता है। समय के साथ इसकी छवि सत्ता में अपनी हिस्सेदारी चाहते एक शक्ति-समूह के रूप में भी बनी है। इस चयन में मीडिया के सरोकारों से संबंधित विभिन्न विषयों पर संवाद करती कविताओं का संकलन किया गया है।
18 अक्तूबर 2026
रील रसाचार्य : रील में भागते लोग
यह देश एक महामेला है। वैसे तो पूरी दुनिया ही मेलों से बनी-बढ़ी है और मेले और बाज़ार ही थे जिन्होंने इस उपमहाद्वीप को हमेशा के लिए बदल दिया। पुर्तगाली, यूनानी, डच, फ़्रांसीसी, अँग्रेज़ यह सब यहाँ की ह
11 अक्तूबर 2026
रील रसाचार्य : रील बीच नाना
मैं संभवत: तीसरी या चौथी कक्षा में था जब छोटे भाई ने कहा सिर के पीछे नहीं मारना चाहिए यहाँ पे छोटा दिमाग़ होता है। यह बात उसने एक फ़िल्म से सीखी थी जिसमें कोई अजीब-सा हीरो था जो हीरो कम ग़द्दार (विलेन
09 अक्तूबर 2026
जगह-जगह 2.0 : दोस्तोयेवस्की को बख़्श दीजिए
“Isn’t it maddening? Just when you begin to recognize a man called Alexandre, he is called Sacha, and then Satchka, and later Sachenka, and suddenly something pretentious like Alexandre Alexandrovitc
04 अक्तूबर 2026
रील रसाचार्य : रील काटने और कटवाने वाले
जब कोई वक्ता किसी सार्वजनिक मंच पर बोलता है और जानता है कि कैमरे लगातार उसे रिकॉर्ड कर रहे हैं, तो वह कुछ अतिरिक्त सतर्क हो जाता है। उसे डर रहता है कि उसकी बात मीम या रील में बदल जाएगी, संदर्भ से काट
27 सितम्बर 2026
रील रसाचार्य : फ़ाइव रील-एक्सपेरिमेंट
एक दोस्त के साथ फ़िल्म देख रहा था। हर महत्त्वपूर्ण दृश्य से पहले; आगे क्या होने वाला है, उसे पहले से पता था। जब ऐसा दो बार हो गया तो मैंने कहा कि जब फ़िल्म पहले से ही देख रखी है तो क्या ज़रूरत थी दुब
20 सितम्बर 2026
रील रसाचार्य : माटी को पुतरा कैसे नचत है
रील का क्या है! ‘हिन्दवी’ ने एक कॉलम घोषित किया था : ‘रीलमरील’। इसे जिन्हें लिखना था, वह लिख नहीं पाए। इसके बावजूद समय-समय पर इस कॉलम के अंतर्गत तीन लेख आए, जिनमें से एक मैंने भी लिखा। फिर यह कॉलम स्
12 अगस्त 2026
हमने चीख़ को ही रिपोर्टिंग समझ लिया
आज 12 अगस्त है। छह साल पहले कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी ने न्यूज़ डिबेट के दौरान आए हार्ट अटैक में अपनी जान गँवा दी थी। कम से कम उनके डॉक्टर ने तो यही कहा था। हर साल उनकी याद आती है। इस बार याद
01 अगस्त 2026
शनिवारेर चिट्ठी : गाली बयान नहीं चीख़ है
सिनेमा शासकों को यह भ्रम प्रिय होता है कि वे इतिहास लिखते हैं। वे यह नहीं समझते कि एक पोस्टर, एक भंगिमा, एक नारे, एक मीम से उनके इस कथित इतिहास को चुनौती दी जा सकती है। इन दिनों मुझे एक फ़िल्म याद
जेन ज़ी को ग़लत मत समझियो
काफ़ी समय से कॉकरोच जनता पार्टी के हालिया आंदोलन की चर्चा है। इस आंदोलन के कारण शिक्षा मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा। कई लोग इसका श्रेय जेन ज़ी को दे रहे हैं, क्योंकि इस आंदोलन में इस पीढ़ी की भागीदार
अलंकार मिश्रा का क्या है!?
एक दुबला-पतला आदमी अलंकार मिश्रा! बीड़ी (या...) पीते हुए रील्स में दिखता है। गाँव-क़स्बे जैसा बैकग्राउंड, बिना माइक की आवाज़, मुँह से धुँआ निकल रहा है। वीडियो इंटरेस्टिंग लगता है। हम उस पर रुकते हैं।
विचारों का युग, सिनेमा, बौद्धिक संपदा और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस
गूगल के आने से दुनिया आसान हुई और तथ्यों की एक्सेसिबिलिटी बढ़ी। इस दौर में विजुअल नैरेटिव और पैडागॉजिकल टूल्स बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं। दुनिया भर में कई सारी लाइब्रेरी और कॉलेजेस डिस्फ़ंक्शनल हो रहे
नई पीढ़ी नए बदलाव : इमोजी से रील्स तक
विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य की कक्षाओं की अपनी टिपिकल संस्कृति होती है—चरणस्पर्शी और बहुत छुईमुई। इन कक्षाओं में प्रेमचंद, प्रेमचंद नहीं रहते, “प्रेमचंद जी” हो जाते हैं, “निराला जी”, “मुक्ति
किरीस का गाना सुनेगा! ले बेटा...
21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा समाप्त हो चुका है। सरकारी आँकड़ों की मानें तो हम आधुनिकता के आगे निकल चुके हैं। यानी उत्तराधुनिकता में प्रवेश कर चुके हैं, जिसके कई उदाहरण हमें दिखाई देते हैं। इनमें से ए
ऐसे वीडियोज हमारी सामूहिक विफलता का दस्तावेज़ हैं
इधर दो-तीन दिनों से इंस्टाग्राम, X और रेडिट जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर एक पोर्न वीडियो की चर्चा है। सामान्य तौर पर ऐसे एमएमएस हर रोज़ सैकड़ों की संख्या में प्रसारित होते रहते हैं और लोग उन्
14 अक्तूबर 2025
पत्रकारिता के दुर्दिनों में, यह फ़िल्म देखी जानी चाहिए
हॉस्टल में शाम की चाय और रात के खाने के वक़्त पर यूट्यूब पर कुछ देखना भी दिनचर्या का लगभग अनिवार्य हिस्सा बन गया है। आज शाम को जब इस अनिवार्यता की पूर्ति के लिए यूट्यूब खोला तो सबसे ऊपरी पंक्ति में ह
क्या आप भी रील-रोग से ग्रस्त हैं?
रील-रोग से ग्रस्त और कुछ-कुछ कुपित एक रीलर-इन्फ़्लुएंसरों मित्र ने बेहद ऊबकर मुझसे पिछले दिनों कोई किताब पढ़ने की जिज्ञासा व्यक्त की। उन्हें शुरुआत करने में मुश्किल आ रही थी। मित्र पूरब के निवासी हैं,
हम चुटकुलों से ख़फ़ा हैं
आमतौर पर तो भारतीय प्रथा यह है कि ज़रूरी मुद्दों को चुटकुला बना दिया जाए। लेकिन कभी-कभी जब किसी सुहाने दिन मंद-मंद-सी बयार बह रही हो, फ़िज़ा तनिक महकी-महकी-सी होने लगे, तो सोने पर सुहागा यह कि संडे ट
17 अगस्त 2025
बिंदुघाटी : ‘सून मंदिर मोर...’ यह टीस अर्थ-बाधा से ही निकलती है
• विद्यापति तमाम अलंकरणों से विभूषित होने के साथ ही, तमाम विवादों का विषय भी रहे हैं। उनका प्रभाव और प्रसार है ही इतना बड़ा कि अपने समय से लेकर आज तक वे कई कला-विधाओं के माध्यम से जनमानस के बीच रहे है
बेवफ़ा सोनम बनी क़ातिल!
‘बेवफ़ा सोनम बनी क़ातिल’—यह नब्बे के दशक में किसी पल्प साहित्य के बेस्टसेलर का शीर्षक हो सकता था। रेलवे स्टेशन के बुक स्टाल्स से लेकर ‘सरस सलिल’ के कॉलमों में इसकी धूम मची होती। इसका प्रीक्वल और सीक्वल
व्यंग्य : अश्लील है समय! समय है अश्लील!
कुछ रोज़ पूर्व एक सज्जन व्यक्ति को मैंने कहते सुना, “रणवीर अल्लाहबादिया और समय रैना अश्लील हैं, क्योंकि वे दोनों अगम्यगमन (इन्सेस्ट) अथवा कौटुंबिक व्यभिचार पर मज़ाक़ करते हैं।” यह कहने वाले व्यक्ति का
जीवन को धुआँ-धुआँ करतीं रील्स
मैं बहुत लंबे समय से इस बात पर चिंतन कर रहा हूँ और यह कितना सही और ग़लत है—यह तो खोजना होगा; पर मैं मान कर चल रहा हूँ कि रोमांस मर चुका है। उसके साथ ही मर चुका है साहित्य। कला दम तोड़ रही है। अगर यह क
महान् दार्शनिक दीपक कलाल का 'मुआ' फ़िनोमिनन
प्रत्येक देश-काल में कोई न कोई प्रसिद्ध दार्शनिक ज़रूर होता है, जो उस समय को चिह्नित करता है और साथ ही उस समय की युग-चेतना को दर्शाने वाला दर्शन प्रस्तुत करता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि महान् दार
व्यक्तित्व-निर्माण की सीढ़ियाँ : प्लेज़र, कंफ़र्ट जोन, बिस्तरों और कुर्सियों में फँसे लोग
आज मानव जिस धरातल पर अपने जीवित होने के हस्ताक्षर—हर क्षण साँसों के द्वारा—जिस तरह कर रहा है, उसे मद्द-ए-नज़र रखते हुए यह सवाल पूछना ज़रूरी हो गया है कि क्या वह वाक़ई जी रहा है? या बस पलायन करना चाहत
आवाज़ की दुनिया के दोस्तो!
कोविड की हाहाकारी लहर के बीच जनजीवन का ख़तरा इतना अबूझ था कि लोग उसे हर संभव जानने-समझने की कोशिश में लगे थे। वे हर किसी की बात सुन रहे थे, गुन रहे थे, धुन रहे थे। उनके लिए आख़िरी और प्रामाणिक सत्य कुछ
सिफ़्सी लेकर आ रहा है देश-विदेश की 150 फ़िल्में
स्माइल फ़ाउंडेशन—यूरोपीय संघ (भारत में यूरोपीय संघ का प्रतिनिधिमंडल) के साथ साझेदारी में बच्चों और नौजवानों के लिए वार्षिक स्माइल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (सिफ्सी) के 10वें संस्करण की मेज़बानी करेगा। स