जो मनुष्य यह मेरा और वह तेरा मानता है, वह अनासक्त नहीं हो सकता।
स्त्रियों को पुरुषों के साथ खुली प्रतियोगिता न करने देना, अन्यायपूर्ण और एक तरह का सामाजिक अपराध है।
मानवीय आचरण के आम उद्देश्य ही यह तय कर देते हैं कि कोई व्यक्ति या तो ग़लत कार्यक्षेत्र में आए ही नहीं, या उसमें ज़्यादा देर टिके नहीं।
स्वतंत्रता और प्रतियोगिता ख़ुद ही यह तय कर देते हैं कि बेहतर भुजबल वाले व्यक्ति ही इस क्षेत्र में आएँ, और कमज़ोर बाँहों वाले व्यक्ति कोई दूसरा कार्यक्षेत्र चुनें।
चिकित्सा के क्षेत्र में होने वाले विकास में हमेशा असमानता बढ़ाने की ताक़त होती है।
महानता के लिए अपनी प्रतिद्वंद्विता के द्वारा संपूर्ण युग को विभक्त कर देने वाले प्रतिद्वंद्वियों के बीच की बातों को ठीक कर देना भावी पीढ़ियों का ही विशेष अधिकार है।
कुश्ती का उद्देश्य सुरुचिपूर्ण स्पर्धा ही होनी चाहिए, निर्दयता का प्रसार नहीं। जिसके शरीर में बल है और पास में मल्लशास्त्र का ज्ञान है वह आवश्यकता पड़ने पर शत्रु को परास्त कर सकता है और दुष्ट को दंड दे सकता है परंतु अखाड़े में प्रतिस्पर्धी के हाथ-पाँव तोड़ना कदापि श्लाघ्य नहीं है।
ईर्ष्या व्यक्तिगत होती है और स्पर्द्धा वस्तुगत।
अल्प बौद्धिक क्षमता के लोग प्रतियोगिता के भय से आक्रांत रहते हैं जैसे बौने सड़क पर कुचले जाने के भय से।
प्रतिस्पर्धा की समस्या यह है कि यह हमें अभाव की मानसिकता देती है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere