किसान को—जैसा कि ‘गोदान’ पढ़नेवाले और दो बीघा ज़मीन' जैसी फ़िल्में देखनेवाले पहले से ही जानते हैं—ज़मीन ज़्यादा प्यारी होती है। यही नहीं, उसे अपनी ज़मीन के मुक़ाबले दूसरे की ज़मीन बहुत प्यारी होती है और वह मौक़ा मिलते ही अपने पड़ोसी के खेत के प्रति लालायित हो उठता है। निश्चय ही इसके पीछे साम्राज्यवादी विस्तार की नहीं, सहज प्रेम की भावना है जिसके सहारे वह बैठता अपने खेत की मेड़ पर है, पर जानवर अपने पड़ोसी के खेत में चराता है।
लोग समझदार हो गए हैं, इसलिए अविरोध की साधना में लग गए हैं।
सरकार का विरोध करना भी, सरकार से लाभ लेने और उसमें संरक्षण प्राप्त करने की एक तरक़ीब है। लेखक न अब 'बेचारा' रह गया है, न भोला। वह जानता है कि सरकार का विरोध करने से कभी-कभी समर्थन से अधिक फ़ायदे मिलते हैं।
चाहिए यह कि लीडर तो जनता की नस-नस की बात जानता हो, पर लीडर के बारे में कुछ भी न जानता हो।
अड़चन के और पोल खोलने वाले सवालों का जवाब चतुर लोग नहीं देते।
चतुर स्त्री को चाहिए कि वह सर्वप्रथम प्रभाव, लाभ, पर्याप्त प्रेम और सौहार्द को दृष्टि में रखकर, फिर किसी बिछुड़े हुए पुराने प्रेमी से संबंध स्थापित करे।
प्रेम चतुर मनुष्य के लिए नहीं, वह तो शिशु से सरल हृदयों की वस्तु है।
शिवपालगंज के बच्चे-बच्चे को प्राणिशास्त्र का यह नियम याद था कि होशियार कौआ कूड़े पर ही चोंच मारता है।
चालाकी से ज़्यादा, हमें दयालुता और सौम्यता की आवश्यकता है।
अविरोध की साधना उन्हें सुहाती है जिनमें अतिरिक्त स्वार्थ-सजगता होती है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere