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पूँजी पर गीत

आधुनिक राज-समाज में

पूँजीवाद के बढ़ते असर के साथ ही उसके ख़तरे को लेकर कविता सजग रही है। कविता जहाँ अनिवार्यतः जनपक्षधरता को अपना कर्तव्य समझती हो, वहाँ फिर पूँजी की दुष्प्रवृत्तियों का प्रतिरोध उसकी ज़िम्मेवारी बन जाती है। प्रस्तुत चयन ऐसी ही कविताओं से किया गया है।

मुश्किल हुआ निबाह

विभूति तिवारी

किसकी कौन सुने

जय चक्रवर्ती

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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