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अत्यधिक दुःखी लोग गलती से काव्य-क्षेत्र में आ जाते हैं। जो वे गीतों में सिखाते हैं, उसे वे दुःखों में सीखते हैं।
कल्पना की तुलना में बुद्धि इसी प्रकार है जैसे कर्ता की तुलना में उपकरण, आत्मा की तुलना में शरीर और वस्तु की तुलना में उसकी छाया।
यदि शीत ऋतु आ गयी है, तो क्या वसंत ऋतु अधिक दूर हो सकती है?
हम भूत और भविष्य को देखते हैं और जो नहीं है उसकी कामना करते हैं। हमारा निष्कपट हास्य भी किसी वेदना से युक्त होता है।
हमारे मधुरतम गीत वे ही होते हैं जो अधिकतम विषादयुक्त विचार व्यक्त करते हैं।
एक ही नित्य रहता है, अनेक तो परिवर्तित होते हैं और चले जाते हैं। स्वर्गीय प्रकाश नित्य चमकता है, पृथ्वी की छायाएँ उड़ जाती हैं। बहुरंगी शीशे के गुंबद के समान जीवन शाश्वत के शुभ्र प्रकाश को रंग-बिरंगा कर देता है।