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मुझे दिक् और काल से अधिक परेशान करने वाला कुछ नहीं है और फिर भी इनसे कम परेशान करने वाला भी कुछ नहीं है। कारण यह है कि मैं इनके बारे में कभी सोचता ही नहीं हूँ।
मुझे लोग पसंद करें, यह मैं कितना चाहता हूँ परंतु लोग मुझे चाहें, इसके लिए मैं करता क्या हूँ!
मेरा तात्पर्य है तुम्हारी पुस्तकों को उधार माँगने वाले व्यक्तियों से—जो संग्रहों को विकृत कर देते हैं, तख्तों के संतुलन को बिगाड़ देते हैं, और अच्छी ख़ासी पुस्तकों को विचित्र बना देते हैं।
मैं दूसरे मनुष्यों के चित्तों में स्वयं को खो देने से अनुराग करता हूँ।
पुस्तकें जो कि पुस्तकें नहीं हैं—अपितु पुस्तकों की वेशभूषा में वस्तुएँ हैं।
मानव जाति के विषय में जो सर्वोत्तम सिद्धांत मैं बना सका हूँ, उसके अनुसार इसमें दो प्रजातियाँ हैं—उधार लेने वाले मनुष्य, और उधार देने वाले मनुष्य।