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उपकारों को भूलना मनुष्य का स्वभाव है। अतः यदि हम दूसरों से कृतज्ञता की आशा करेंगे तो हमें व्यर्थ ही सर दर्द मोल लेना पड़ेगा।
जिन बातों के लिए आप कृतज्ञ हैं उन्हीं के विषय में सोचिए और उपलब्ध ऐश्वर्य तथा वैभव के लिए भगवान को धन्यवाद दीजिए।
सुखी बनने के लिए कृतज्ञता और कृतघ्नता का झमेला छोड़कर मनुष्य आत्मानंद के लिए दान करें।
नेतृत्व उस व्यक्ति को मिलता है जो खड़ा होकर अपने विचार व्यक्त कर सके।
प्रत्येक घटना के उज्ज्वल पक्ष को देखने के स्वभाव का मूल्य हज़ारों रुपए प्रतिवर्ष से भी अधिक होता है।
दूसरों की नक़ल न कीजिए, अपने को पहचानिए और जो आप हैं वही बने रहिए।