शून्य स्थान में ही स्थिरता संभव है।
धारणा का सूझना पर्याप्त नहीं है। उसे सिद्ध करना होता है। सिद्धता के लिए विचारों का अनुशासन अनिवार्य है।
आत्मा को न तो शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है। उसी प्रकार न तो इसको पानी गला सकता है और न वायु सुखा सकता है। यह आत्मा कभी न कटने वाला, न जलने वाला, न भीगने वाला और न सूखने वाला तथा नित्य सर्वव्यापी, स्थिर, अचल एवं सनातन है।
दुःख की स्थिति प्रायः स्थायी है।
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वह पूर्ण से भी पूर्ण है, सदा स्थिर रहने वाला है और कृपालु है। इच्छानुसार देने वाला है, जीविका देने वाला है, कृपालु और दयालु है।
जिस प्रकार कमल के पत्ते पर गिरी हुई जल की बूँद उसमें स्थिर नहीं रहती है, उसी प्रकार अनार्यों (नीचों) के साथ मित्रता स्थिर नहीं होती है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere