विश्वविद्यालयों में तो गुरु-कृपा से ही डिग्री मिलती है। सब जानते हैं, पढ़ने से कुछ नहीं होता। अगर आचार्य की कृपा हो जाए, तो प्रतिद्वंद्वी विद्यार्थी का अँगूठा काटकर वह प्रिय विद्यार्थी को दे देता है। राजा के लड़के और भील के लड़के में जो अंतर तब था, वही अब है।
कोई-कोई सनकी राजा ऐसे होते थे कि अपने नौकर को कोड़ों से ख़ूब पीटते थे, मगर उनकी चिकित्सा के लिए डॉक्टर तैयार रखते थे। अपनी सरकार भी सनकी ज़मींदार है। शिक्षक को ख़ूब कष्ट होने देगी, मगर कल्याण-निधि ज़रूर खोल देगी।
आज राजा का राज्य उस समय तक है, जब तक वह प्रजा के अनुसार चलता है।
राजा के लिए अर्थ को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है, क्योंकि अर्थ संपूर्ण लोकयात्रा का मूल है और वेश्या के लिए अर्थ को अधिक उपादेय बताया है। इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम—त्रिवर्ग की प्रतिपत्ति का प्रतिपादन है।
जिस राजा का व्यवहार ऐसे प्रत्येक कार्य से भरा है, जो अत्याचार की व्याख्या है—वह स्वतंत्र जाति का शासक होने योग्य नहीं है।
संसद एक झंझट की संस्था होती है, इसलिए तानाशाह, महाराजाधिराज, शहंशाह चुनाव करके संसद बनने ही नहीं देते थे।
जिसमें आम के बौरों के केसरसमूह की सुगंध से दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, और मीठे-मीठे मकरंद का पान कर भ्रमर उन्मत्त हो रहे हैं—ऐसे ऋतुराज में किसे उत्कंठा नहीं होती।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere