कहानी : कुछ रह गया
सूरज की पहली किरण उसके कमरे में दाख़िल हुई। दीवार से टकराकर वह उसके चेहरे पर ठहर गई। ठंडी हवा का एक झोंका उसकी पलकों को हल्के से छू गया, मानो रात भर उसे दर्द में लिपटा देख यह सुबह अपना सारा स्नेह उस
80 के दशक के रेट्रो लुक से स्मृति और नॉस्टेल्जिया तक
यह बात मान लेनी चाहिए कि हम अपने अतीत से कितना स्नेह रखते हैं। हम वहाँ सुखद अनुभूति करते हैं, सुरक्षित महसूस करते हैं। अतीत हमारे वर्तमान की ख़ाली जगहों को भरता है। वह बार-बार याद आता है, बावजूद इसके
12 सितम्बर 2026
शनिवारेर चिट्ठी : दोष लगे सितंबर को!
प्रस्थान कुछ बादल अधिक, कुछ धूल कम। सितंबर। कोई गली ठीक उसी छत पर नहीं रुकती। अकेली नमी कोई त्योहार नहीं है। घाणी है सुनहरी। बचने का संकेत कभी बताया नहीं जाता। सितंबर कोई ठहराव नहीं है। कीचड़ से
ममता कालिया के नाम एक छात्र का खुला ख़त
आदरणीय ममता कालिया जी, नमस्कार! “रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों।” विद्यानिवास मिश
हम आधा-आधा जीने के आदी हैं
~•~ हमारी अनुभूतियाँ विकृत हैं। हम सही से कुछ महसूस नहीं कर पाते। हमारी स्मृतियाँ क्षत-विक्षत हैं। हम ठीक-ठीक कुछ याद नहीं कर पाते, हम पूरी तरह कुछ विस्मृत नहीं कर पाते और अपनी इस असमर्थता को ‘सब समय
रागदर्पण : कंधे आख़िर किसलिए होते हैं
उसका संग छूटते ही मेरे चौखूँट एक अजब निस्संगता आकर बैठ जाती थी कि फिर कई घंटों तक किसी की भी मौजूदगी मुझे उकताऊ और नागवार लगती। उसके साथ कोई आशनाई न थी; मगर हो सकने का भारी इमकान था, अगर मैं अपनी सन्
मैं वापस आऊँगा : 78 घंटे बनाम 78 साल का प्रेम
जीवन में पहली बार अकेले फ़िल्म देखने आई हूँ। अकेले घूमी हूँ, शॉपिंग पर गई हूँ, पर अकेले थिएटर में बैठकर फ़िल्म देखना कभी नहीं हुआ था। शायद इसलिए क्योंकि मुझे लगता था कि मैं दुनिया में इस क़दर अकेली क
17 जून 2026
राप्ती से गंगा तक, गंगा से राप्ती तक
राप्ती से गंगा तक राप्ती एक सदाबहार नदी है जो मेरे गाँव से लगकर बहती है। मेरे घर के छत से उसकी विशालता को देखा जा सकता है। मेरा बचपन इसकी धाराओं के साथ खेलने में बीता है। इसकी नन्हीं-नन्हीं मछलियो
केवल ताली ही तो है : प्रयागराज के NCZCC में ‘ओथेलो’ और रवींद्रालय में ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ देखते दर्शकों का स्त्री-द्वेष
बीते दिनों इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में दो महत्त्वपूर्ण नाटकों का मंचन हुआ—19 मार्च 2026 को एनसीज़ेडसीसी (NCZCC) में शेक्सपीयर के ‘ओथेलो’ का, जिसका निर्देशन आलोक नैयर ने किया और 26 मार्च 2026 को रवींद
जगह-जगह 2.0 : क्या कर रही होगी जबलपुर में तुम
शहरज़ादे का शहरआशोब जबलपुर को खोजता हूँ तो पहले उन सूचियों से उलझता हूँ जिनमें 12 सड़कों और 13 जनों की, 5 मोहल्लों और 3 उद्यानों की, 2 पुलों और 52 तालाबों की, एक कल्चुरी काल के तेवर की, एक विलियम स्
09 मई 2026
शनिवारेर चिट्ठी : वहाँ नहीं है अब कोई घर सुफ़ेद
स्मृति के घर अँधेरा स्मृति के घर अँधेरा बहुत है। सिर्फ़ आँखें काम नहीं करतीं। नाक भी लगता है काज पर। शून्य को सुनना पड़ता है कानों को। हाथों को हवा को टटोलना पड़ता है। विस्मृति ने कोई शोर भी तो नहीं
स्मृतियों के सिवा कुछ भी नहीं
यदि तुम बरसों बाद घर लौटकर आओ—तो वे एकदम पहचान लेते हैं, पर वे यह नहीं जानते, तुम कहाँ से लौटकर आए हो। वे कभी सोच नहीं सकते कि इतनी यातना सहकर उन्होंने जिसे जन्म दिया है, वह बड़ा होकर इतनी यातना बर्द
शनिवारेर चिट्ठी : दिनानुदिन की चूलें बिठाते हुए
सोमवार मैं लौटने की आख़री सड़क पर हूँ। यह सोमवार की तेज़ भागती सड़क है। इसकी रफ़्तार को दो दिनों के घर-आराम के बाद ‘काम पर लौटने’ के पंख लगे हैं। घर से पश्चिम की ओर निकलती है पहली सड़क। वह रास्ता बदलती
शनिवारेर चिट्ठी : कल से रवैया फ़र्क़ होगा
अथ कोई अलसकथा नहीं! रविवार के उस दुपहर-उष्ण में ऊँघने के स्वाँग में तुम्हारी पीठ पर श्वासों की सुदीर्घ कविताओं का पाठ नहीं कर सका, खमा करो। मुझे एक नए आरंभ की पहली सीढ़ी पर पाँव धरने थे। अभी कितना
चुप्पी में सारे उत्तर छुपे होते हैं
20 जुलाई 2022 अदीब अचानक नींद से उठ बैठा। किसी ऊबड़-खाबड़ सपने की वजह से शायद। कुछ क्षण बाद ठीक से उसकी चेतना लौटी तो उसको लगा कि वह अकेला नहीं सो रहा है, कमरे में चैतन्या की यादें भी सो रही हैं। इस
कहानी : मैं किसी के लिए कुछ नहीं हूँ
“अब भी क्या गले न मिलोगी? अभी तक वही हिचक... मिल लो यार, क्या पता अगली मुलाक़ात हो न हो।” उसकी पसीजी हुई हथेलियाँ छूट रही थीं मुझसे। वो गले लगने या लगाने को बेताब था। विदा की बेला में ये बातें मेर
पास्ट लाइव्स : जो था, जो है और जो रह जाएगा
साल 2023 में आई हुई एक दक्षिण कोरियाई फ़िल्म है—पास्ट लाइव्स। कोरियाई मूल की कनाडाई निर्देशक सेलीन सॉंग की इस फ़िल्म का बहुत नाम सुना। अनगिनत सिने-फ़ाइल्स यूट्यूब चैनलों, इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक अकाउंटो
तुम्हें विदा करने में असमर्थ हूँ!
यह दिन पिछले दिनों से कितने भिन्न हैं, इन दिनों तुम्हें खोने के भय के सिवा मेरे पास और कुछ भी नहीं। प्रेम-प्रसंग के ये अंतिम दिन इतने अरुचिकर और अवसादमय भी हो सकते हैं, यह मैंने कभी नहीं सोचा था। सोच
प्रेम के पाँच पत्र और प्रलोभन की एक कथा
मेरानो, 15 जून 1920 मंगलवार इस अलस्सुबह मैंने फिर तुम्हें स्वप्न में देखा। हम साथ बैठे थे और तुम मुझे दूर कर रही थीं—ग़ुस्से से नहीं, सहज आत्मीयता से। मैं बेहद दुखी था। इसलिए नहीं कि तुम मुझे दूर
अविश्वासी हो रहे हो प्रेम!
मैं अब किसी से प्रेम नहीं कर पाती हूँ। मैं इसे समझ पा रही हूँ कि मैं क्यों किसी से प्यार नहीं कर पा रही हूँ, लेकिन लोग इसे समझ नहीं पा रहे हैं। मेरी आँखों में अब किसी के लिए आँसू नहीं आते। सिर्फ़ एक
09 फरवरी 2026
शिरीष कुमार मौर्य के बहाने : बनारस से निकला हुआ आदमी
मैं पहली बार शहर आए किसी गँवई किसान-सा निहारता था चीज़ों को अलबत्ता देखे थे कई शहर जीवन के धूप-छाँव में यात्राएँ कहीं पीछे छूट जाती हैं। जीवन में आने वाली समानांतर समस्याएँ समझौते करने को वि
शंखनाद : जिसे फ़रवरी मयस्सर नहीं
हर आदमी को फ़रवरी मयस्सर नहीं होती। कितना भी झींख लो, रो लो, कलप लो—एहसास-ए-फ़रवरी नहीं बदा तो कहाँ से मिलेगा। टापते रहिए इधर से उधर, फ़रवरी नहीं आएगी, बदनामी ज़रूर हो जाएगी। फ़रवरी महीना नहीं, मनोदश
खुजली देसी बीमारी है
एक साहित्यिक आदमी खुजली को डॉक्टर के नज़रिये से नहीं देख सकता है। उसे केवल संक्रामक बीमारी कहकर संतुष्ट नहीं हो सकता। इसके पूर्व कि मैं खुजली पर बात करूँ, मुझे मौजूदा समय के हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कथा
एक लाख अस्सी हज़ार चार सौ बावन मिनट का इंतज़ार
जानते हो तीन हज़ार घंटे कितनी देर में बीतते हैं? नहीं जानते। चार महीने, ग्यारह दिन में। दिन-रात, सुबह-शाम सब जोड़ दें तो। चार महीने, ग्यारह दिन। मैं कोई देवदास की पार्वती नहीं हूँ, जिसने पल में
यह ख़ाली जगह नहीं भरेगी
एक जनवरी को वह जब इस दुनिया में आया था, कड़ाके की ठंड थी। नए साल की सौगात लेकर वह आया था। तब देश आज़ाद भी नहीं था। किसे पता था यह बालक कितने लोगों के जीवन में आज़ादी लेकर आएगा—विचारों की आज़ादी। जिस
स्त्री और माँ
प्रस्तुत लेख ‘हिन्दवी’ पर प्रकाशित ‘बेला’—‘सदी की आख़िरी माँएँ’, प्रणव मिश्र तेजस के लेख की प्रतिक्रिया में लिखा गया है। ‘सदी की आख़िरी माँएँ’ (मूल लेख) प्रथम—23 नवंबर को ‘हिन्दवी’ पर प्रकाशित हुआ। इसे
...फिर इस साल का आख़िरी ख़त
एमजे, परंपराएँ कवियों को कहीं का नहीं छोड़तीं। ऐसे ही दिनचर्या की आदत। यह चाहते हुए भी कि किसी तरह की आदत बुरी न बने, कई नशे आदमी ज़िंदगी में ओढ़ लेता है। एक बहुत भारी साल के तमाम होते-होते, जिस इ
बाग़ी मन की बातें : एक पुरुष की देह को लेकर
बहुत याद करने पर भी और बहुत मूड़ मारने पर भी पिछले दिनों ठीक-ठीक यह याद नहीं आया कि उस दिन हमारे घर में कौन-सा आयोजन था। हाँ, यह ख़ूब याद है कि उसी बरस किसी महीने दादी मरी थीं; पर यह याद नहीं आता कि वह
‘आधी पंक्ति’ में पूरा प्रेम
क्या प्रेम अपने चरम पर पहुँचकर स्वयं की विफलता में ही अपने शाश्वत अर्थ को उद्घाटित करता है? आस्था, प्राप्ति और पराजय के बीच बने चक्रव्यूह को लांघने में असफल आत्म ही उस पात्रता को प्राप्त करता है, जिस
लॉकडाउन डायरी : सत्ता मेरे मज़े लेती है और मैं अपने से कमज़ोर लोगों के मज़े लेता हूँ...
रात्रि की भयावहता में ही रात्रि का सौंदर्य है 25 मार्च 2020 पूर्व दिशा की ओर से खेरों की झाड़ियों में से उठती निशाचर उल्लुओं की किलबिलाहट से नींद खुल गई। यूँ तंद्रा का टूटना अनायास ही अकुलाहट क
कहानी : आकांक्षा
मेरे हाथ में संडे का अख़बार है। मेरे बाजू के स्टूल पर सुबह की पहली चाय का कप। स्मिता भी चाय पी रही है। बरसों पहले फ़्रेम करवायी गई रवींद्रनाथ ठाकुर की यह तस्वीर किताबों की रैक के नीचे टंगी है। रवी बा
बीथोवन के संगीत के लिए
दुनिया को हिटलर के ‘होलोकास्ट’ के लिए नहीं, बीथोवन की ‘सिम्फ़नी’ के लिए याद रखा जाना चाहिए। हिटलर की नफ़रत से और उसके द्वारा की गईं यहूदियों और उनके बच्चों की हत्याओं के बाद भी यह दुनिया ख़त्म नहीं ह
अँगूठा मेहनत कर रहा है, दिमाग़ आराम!
सड़क के किनारे फ़ुटपाथ पर लेटा बूढ़ा व्यक्ति लगातार खाँस रहा है। बग़ल में बैठा जवान बेटा हथेली पर खैनी ठोंकते हुए खाना बनने का इंतज़ार कर रहा है। चेस-नुमा शरीर के साथ अधनंगा एक छोटा बच्चा खेल रहा है।
विकुशु के नाम एक पत्र
प्रिय विनोद कुमार शुक्ल जी, आपको मेरा सादर प्रणाम! मैंने जब ‘हिंद युग्म’ महोत्सव (रायपुर) में आपको पहली बार देखा और आपसे मिली तो मेरे मन में पहले जो भी भ्रांतियों के बादल घिरे थे, सब छँट गए। सो
चौदहवीं तितली कहीं नहीं मिली
धूप इतनी तीखी थी कि मेरी गर्दन पर पसीने की बूँदें काँटों की तरह निकल आई थीं, लेकिन में उसकी आँखों से झरती ओस में राहत महसूस कर रहा था। उसने कहा—मैंने तुम्हारे इन पत्रों को बार-बार पढ़ा। ना जलाने की
दोस्ती क़ब्रिस्तान है और दोस्त क़ब्र
दोस्त सिर्फ़ दोस्त होते हैं। बहुत सारा साथ, सामर्थ्य, साहस और प्रेम उसी में समाहित होता है। किसी भी इंसान के बारे में दूसरे लोग सिर्फ़ अंदाज़ा लगा सकते हैं, सच सिर्फ़ दोस्तों को पता होता है, उनसे छिप
अस्सी वाया भाँग रोड बनारस
कितना अजीब है किसी घटना को काग़ज़ पर उकेरना। वर्तमान में रहते हुए अतीत की गुफाओं में उतरकर किसी पल को क़ैद कर लेना। उसे अपने हिसाब से जीने पर मजबूर कर देना। मैं कितनी बार कोशिश करता हूँ कि जो घटना बार-ब
बीमार मन स्मृतियों से भरा होता है
गए दिन जैसे गुज़रे हैं उन्हें भयानक कहूँ या उस भयावहता का साक्षात्कार, जिसका एक अंश मुझ-से मुझ-तक होकर गुज़रा है। चोर घात लगाए बैठा था और हम शिकार होने को अभिशप्त थे। जैसे धीरे-धीरे हम उसकी ज़द में स
भूले-भटके दिन : कुछ रूमानी टुकड़े
मैंने अपने सबसे असुरक्षित क्षणों में जब-जब तुम्हें याद किया है, तब-तब यह सवाल आया कि बीतते समय के साथ मैं तुम्हारे लिए महत्त्वपूर्ण रहूँगा कि नहीं! संभव है, यह प्रश्न तुम्हारे ज़ेहन में भी उठता होगा,
अपने माट्साब को पीटने का सपना!
इस महादेश में हर दिन एक दिवस आता रहता है। मेरी मातृभाषा में ‘दिन’ का अर्थ ख़र्च से भी लिया जाता रहा है। मसलन आज फ़लाँ का दिन है। मतलब उसका बारहवाँ। एक दफ़े हमारे एक साथी ने प्रभात-वेला में पिता को जाकर
व्यंग्य : कुत्ते और कुत्ते
बाज़ार में आजकल हिंदुस्तानी-अँग्रेज़ी में लिखी हुई बहुत-सी किताबें आ गई हैं जो कुत्तों के—असली कुत्तों के—बारे में हैं। ‘डॉग केयर बाई ए डाग-लवर’, ‘शेफ़र्ड डाग्स ऑफ़ जर्मनी, बाई ए डॉग-लवर’, ‘ऑफ़ डाग्स
वापसियों की यात्रा क्या त्रासदियों के अंत से शुरू होती है?
अचानक ही तुम्हें अपनी भटक का उद्गम मिल गया है। वह इतना अस्ल है कि तुम उससे घबरा गए हो। तुम चाहते हो, तुम जितनी जल्दी हो सके—उसे भाषा में उतार दो। भले ही वह अधूरा ही उतरे, लेकिन क़ुबूल हो जाए। भले उसक
वॉन गॉग ने कहा था : जानवरों का जीवन ही मेरा जीवन है
प्रिय भाई, मुझे एहसास है कि माता-पिता स्वाभाविक रूप से (सोच-समझकर न सही) मेरे बारे में क्या सोचते हैं। वे मुझे घर में रखने से भी झिझकते हैं, जैसे कि मैं कोई बेढब कुत्ता हूँ; जो उनके घर में गंदे पं
मुझे यूट्यूबर नहीं बनना, पर एक यूट्यूब-चैनल बनाया है : AmoebAI
जिस वक़्त मुझे सबसे ज़्यादा जॉब सिक्योरिटी की ज़रूरत थी, सबसे ज़्यादा फ़ाइनेंशियल सिक्योरिटी की ज़रूरत थी, उस वक़्त मैंने सबसे ज़्यादा बचकाना काम किया। मैंने जॉब छोड़ दी, पर क्यों? और यह बात मैं आप लोगो
देश-प्रेम और पहले प्रेम के दरमियान
मैं एक कहानी कहना चाहता हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि कथा-कहन के पैमानों पर यह सही बैठती नहीं है। फिर यह कहानी कैसे हुई—जब यह मानकों पर खरा नहीं उतरती तो। जो भी हो मैं कोशिश भरपूर करूँगा। मुझे पता है कि
क्या मैं एक आदिवासी नहीं हो सकता!
...बादल बरस रहे हैं। बारिश मतलब क्या—पकौड़े या परेशानी? निर्भर करता है—आप बैठे कहाँ हैं। मैं गाँव के घर में बैठा हूँ। सबसे बाहर वाले मकान में। फ़िलहाल मेरे लिए ‘बारिश’ का मतलब ‘परेशानी’ है। इस बारिश
सब कुछ ऊब के ख़िलाफ़ एक तिलिस्म है
एक It doesn’t take much to console us, because it doesn’t take much to distress us. The Misery of Man without God (B. Pascal, Pensées) मैं पहली बार बर्फ़ से ढके पहाड़ देख रहा था—वह कुछ और
पिन-कैप्चा-कोड की दुनिया में पिता के दस्तख़त
लिखने वाले अपनी उँगलियों का हर क़लम के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। उनके भीतर एक आदर्श क़लम की कल्पना होती है। हर क़लम का अपना स्वभाव होता है। अपनी बुरी आदतें और कुछ दुर्लभ ख़ूबियाँ भी। मैंने ह
विनोद कुमार शुक्ल का आश्चर्यलोक
बहुत पहले जब विनोद कुमार शुक्ल (विकुशु) नाम के एक कवि-लेखक का नाम सुना, और पहले-पहल उनकी ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ हाथ लगी, तो उसकी भूमिका का शीर्षक था—विनोद कुमार शुक्ल का आश्चर्यलोक। आश्चर्यलोक—विकुशु के
इच्छाएँ जब विस्तृत हो उठती हैं, आकाश बन जाती हैं
एक मैं उन दुखों की तरफ़ लौटती रही हूँ, जिनके पीछे-पीछे सुख के लौट आने की उम्मीद बँधी होती है। यह कुछ ऐसा ही है कि जैसे समंदर का भार कछुओं ने अपनी पीठ पर उठा रखा हो और मछली के रोने से एक नदी फूट पड़े