रचनाकार की मौलिकता उसकी संवेदनशीलता में ही नहीं होती, अभिव्यक्ति-प्रणाली के नए विकास में भी होती है।
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कवियों का अपनी कल्पना-शक्ति के द्वारा ब्रह्मा के साथ होड़ करना कुछ अनुचित नहीं है, क्योंकि जगत्स्रष्टा तो एक ही बार जो कुछ बन पड़ा; सृष्टि-निर्माण-कौशल दिखला कर आकल्पांत फ़रराग़त हो गए, पर कविजन नित्य नई-नई रचना के गढ़ंत से न जाने कितनी सृष्टि-निर्माण-चातुरी दिखलाते हैं।
कलाकार होने मात्र से, रचनाकार होने मात्र से कोई व्यक्ति श्रेष्ठ वांछनीयता का अधिकारी नहीं होता।
मनुष्य जो स्वभावतः ही सृष्टिकर्ता, इसीलिए वह हरेक चीज़ को अपनी रचना में परिणत करके उसमें आश्रय लेता है, केवल विधाता की सृष्टि में आरामदेह बिछौना नहीं बनाता।
सर्जक को श्रमजीवी होना चाहिए, प्रेरणाजीवी नहीं।
कविता और कला के निर्माताओं का भी कर्त्तव्य है कि वे आधुनिक देश-काल के समीकरण द्वारा व्युत्पादित सृष्टि, स्थिति और प्रलय-संबंधी सिद्धांतों का उपयोग अपनी अमर कृतियों में कौशल के साथ करें।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere