मैं स्वयं को ईश्वर में विश्वास करने और उसकी प्रार्थना के लिए तैयार नहीं कर सकता।
ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में मेरा अपना विचार यह है कि मनुष्य ने जब अपनी कमियों और कमज़ोरियों पर विचार करते हुए अपनी सीमाओं का एहसास किया, तो मनुष्य को तमाम कठिन परिस्थितियों का साहसपूर्वक सामना करने, और तमाम ख़तरों के साथ वीरतापूर्वक जूझने की प्रेरणा देने वाली तथा सुख-समृद्धि के दिनों में उसे उच्छृंखल हो जाने से रोकने और नियंत्रित करने वाली, सत्ता के रूप ईश्वर की कल्पना की।
मैं यह नहीं मानता कि उन्हीं लोगों ने ईश्वर को पैदा किया, हालाँकि मैं इस मूल बात से सहमत हूँ कि सभी विश्वास, धर्म, मत और इस प्रकार की अन्य संस्थाएँ; अंततः दमनकारी तथा शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों और वर्गों की समर्थक बनकर ही रहीं।
नास्तिकता प्रायः धर्म की प्राणशक्ति की अभिव्यक्ति रही है, धर्म में वास्तविकता की खोज रही है।
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मनुष्य और मनुष्य की मज़दूरी का तिरस्कार करना नास्तिकता है।
ईश्वर को नहीं मानने से सबसे बड़ी हानि वही है, जो हानि अपने को न मानने से हो सकती है। अर्थात ईश्वर को न मानना आत्महत्या के समान है।
हिन्दुस्तान कभी नास्तिक नहीं बनेगा। हिन्दुस्तान की भूमि में नास्तिक फल-फूल नहीं सकते।
पश्चिम की सभ्यता निरीश्वरवादी है, हिन्दुस्तान की सभ्यता ईश्वर को मानने वाली है।
धोखेबाज़ और जादूगरों का शिकार बनने की अपेक्षा, नास्तिकता में जीवन बिताना कहीं अच्छा है।
नास्तिकता शुष्क छिलका है जो ऊपर से विलक हो गया तो उसके नीचे धर्म का कोमल और स्वादिष्ट छिलका पाया गया।
मेरा ईश्वर तो मेरा सत्य और प्रेम है। नीति और सदाचार ईश्वर है। निर्भयता ईश्वर है। ईश्वर जीवन और प्रकाश का मूल है। फिर भी वह इन सबसे परे है। ईश्वर अंतरात्मा ही है। वह तो नास्तिकों की नास्तिकता भी है।
ईश्वर विवेक-बुद्धि है। वह नास्तिक की नास्तिकता भी है।
प्रकृति का निर्देशन और संचालन करने वाली किसी चेतन परमसत्ता का कोई अस्तित्व नहीं है।
आशावाद आस्तिकता है। सिर्फ़ नास्तिक ही निराशावादी हो सकता है।
आस्तिक और नास्तिक दोनों ही आस्थावान होते है। आस्था विधायक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार की होती है।
आस्तिक और नास्तिक उनमें इसी बात पर लड़ाई है। कि ईश्वर को ईश्वर कहा जाए या कोई दूसरा नाम दिया जाए।
ईश्वर को नहीं मानने से सबसे बड़ी हानि वही है, जो हानि अपने को न मानने से हो सकती है। अर्थात् ईश्वर को न मानना आत्महत्या के समान है।
नास्तिकता द्वारा अस्वीकृत सभी महान सत्यों को स्वीकार करने में जितनी श्रद्धा की आवश्यकता है, उससे अनन्त गुनी श्रद्धा नास्तिक बनने के लिए आवश्यक है।
लोग जिस तरह भूतों और प्रेतात्माओं में विश्वास करने लगे, उसी तरह ईश्वर में विश्वास करने लगे। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि ईश्वर में विस्वास सर्वव्यापी है, और इसका दर्शन बहुत विकसित है।
हे ब्रह्मन्! धन के लोभी और नास्तिक मनुष्यों ने वैदिक वचनों का तात्पर्य न समझकर सत्य से प्रतीत होने वाले मिथ्या यज्ञों का प्रचार कर दिया है।
जो ईश्वर पर विश्वास करता है, उसी में आत्मशक्ति है, नास्तिक में आत्मशक्ति नहीं होती।
नास्तिकता अपने आप में ही अमूर्त धारणा है। एक बार जब इस अमूर्तता का जुनून चढ़ जाता है, तो आप अपनी ही कल्पनाशक्ति पर सवार होकर, एकांत में कैनवास के सामने डूब जाते हैं।
वर्णाश्रम की मर्यादाएँ जिन्होंने तोड़ दी हैं—जिन्हें पहले राजदंड दिया जाता था—वे नास्तिक लोग निडर होकर अराजक राष्ट्र में प्रभावशाली बन जाते हैं।
नास्तिक होना भी आसान नहीं है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere