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आहें और राहें

ahen aur rahen

आलोक रंजन

अन्य

अन्य

आलोक रंजन

आहें और राहें

आलोक रंजन

और अधिकआलोक रंजन

    आहें भरना आदत है हमारी

    करवट बदल कर दर्द बोलता है दलित

    दबा, कुचला, हाड़ माँस का झलमलाता आदमी

    कहता है बिना मार खाए

    डाँट सुने

    नींद नहीं आती

    और नहीं आती रोटी भी।

    हम नहीं कर सकते साहब सरकार के

    सामने विरोध

    ज़िंदा हूँ तो

    हक़ है उनका

    मारे काँटे आदि

    जाँचते ही नहीं विरोध के स्वर हमसे

    क्योंकि आज हैं

    कल मार भी दिए जा सकते हैं।

    सोचता हूँ कब तक रहेंगे

    चुप हम

    बोलना सिखाना ही होगा

    अपने बच्चों को आज तेज़

    और भी तेज़

    क्योंकि शासक बहरा होता है

    उसे सुनाई नहीं देता

    दर्द, आहें

    मद्धिम आवाज़।

    स्रोत :
    • रचनाकार : आलोक रंजन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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