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ग़ुलामी पर कविताएँ

ग़ुलामी मनुष्य की स्वायत्तता

और स्वाधीनता का संक्रमण करती उसके नैसर्गिक विकास का मार्ग अवरुद्ध करती है। प्रत्येक भाषा-समाज ने दासता, बंदगी, पराधीनता, महकूमी की इस स्थिति की मुख़ालफ़त की है जहाँ कविता ने प्रतिनिधि संवाद का दायित्व निभाया है।

उठ जाग मुसाफ़िर

वंशीधर शुक्ल

जुमला

रचित

थकान

फ़ेंटन जॉनसन

काला और गोरा

व्लादिमीर मायाकोव्स्की

खाँटी घरेलू औरत-2

ममता कालिया

ताले के लिए

प्रतीक ओझा

स्वतंत्रता और बंधन

ख़लील जिब्रान

शादी की अँगूठी

फरूग़ फरूख़ज़ाद

हाथी

वीरेन डंगवाल

एक मालिक अपने नौकर को

माइकेल ऐंजेलो

1943

सादी यूसुफ़

जान काका

जोर्जे दे लीमा

अफ़्रीक़ा

मिर्ज़ो तुर्सुनज़ादे

ज़ंजीरें

कुमार अम्बुज

एक शाम

हिजम इराबत सिंह

खूँटे से बँधे हुए

रामकृष्ण झा ‘किसुन’

बेड़ियाँ

हो चि मिन्ह

खूँटा

शुभम् आमेटा

भारोत्तोलन

अविनाश मिश्र

पिंजड़ा

जयंत शुक्ल

सहायिका

सुलोचना

वे चाहते हैं

गौरव भारती

रेशम की साड़ी

आलोक आज़ाद

रिहाई

वैशाली थापा

मैं

समर्थ वाशिष्ठ

वजूद

सुषमा सिंह

बकरामंडी

उद्भ्रांत

मुझे याद आ गए सुकरात

नित्यानंद गायेन

उनकी भाषा

कल्पना पंत

पराजय-गीत

बालकृष्ण शर्मा नवीन

मालिक होने की माँग

शिवमंगल सिद्धांतकर

लूप

धीरेंद्र

मूल्य-अंकन

प्रखर शर्मा

बकरा

नित्यानंद गायेन

गाए गए गीत

राजकुमार केसवानी

ग़ुलाम

सोमदत्त

पिंजरे में

अमेय कांत

राखी की सुध

बालकृष्ण शर्मा नवीन

कुत्ता

हरि मृदुल

घोड़ा

नरेश अग्रवाल

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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