कुछ भी इतना मधुर नहीं होना चाहिए कि सुनते ही नींद आ जाए और इतना प्रेरक भी नहीं कि समझने पर वैराग्य आ जाए।
कुछ भी इतना मधुर नहीं होना चाहिए कि सुनते ही नींद आ जाए और इतना प्रेरक भी नहीं कि समझने पर वैराग्य आ जाए।
वेदांत में वैराग्य का अर्थ है—जगत् को ब्रह्मरूप देखना। जगत् को हम जिस भाव से देखते हैं, उसे हम जैसा जानते हैं, वह जैसा हमारे सम्मुख प्रतिभात होता है—उसका त्याग करना और उसके वास्तविक स्वरूप को पहचानना।
महाभारत को जिस प्रकार एक ही समय में कर्म एवं वैराग्य का काव्य कहा जाता है, उसी प्रकार कालिदास को भी एक ही समय में सौंदर्य-भोग एवं भोगविरति का कवि जा सकता है।
आधुनिक मनुष्य से वैराग्य की बात कहना अत्यंत कठिन है।
यदि हम वैराग्यवश पथ को त्याग दें तो बार-बार विपथ में चक्कर काटते फिरेंगे।
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वैराग्य की अति की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी भोगासक्ति।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere