बलात्कार पर उद्धरण
बलात्कार निकृष्टतम अपराधों
में से एक है जो अपनी समग्रता में पूरी मानवीयता को शर्मसार करता है। कविता ने इस विषय पर लगातार संवाद की कोशिश की है। प्रस्तुत चयन ऐसी ही कविताओं का है।
बलात्कार कई रूपों में होता है। हम सिर्फ़ उसे बलात्कार मानते हैं, जिसे छुरा दिखाकर किया जाता है और बाद में हत्या कर दी जाती है या उसे बलात्कार मानते हैं, जिसकी रिपोर्ट पुलिस में होती है। मगर ऐसे बलात्कार असंख्य होते हैं, जिनमें न छुरा दिखाया जाता है, न गला घोंटा जाता, न पुलिस में रिपोर्ट होती है।
बलात्कार का चित्रण साहित्य में शुरू से होता आया है पर उसे देखने की दृष्टि में ज़बरदस्त गुणात्मक अंतर आया है। यह अंतर साहित्य में स्त्री की बदलती छवि और स्त्री विमर्श के बदलते रूपको के कारण आया है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere