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मुसलमान पर कविताएँ

भारतीय समाज में अल्पसंख्यक

होना भी बहुत जटिलताओं से भरा रहा है। सांप्रदायिकता के उभार ने समय-समय पर भारतीय समाज में धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को क्षतिग्रस्त किया है। इस प्रक्रिया में सबसे अधिक आहत मुस्लिम मन और समाज हुआ है। इस चयन में भारत में मुस्लिम होने की जटिलता और मुस्लिम मन की काव्याभिव्यक्तियाँ शामिल की गई हैं।

मुसलमान

देवी प्रसाद मिश्र

नूर मियाँ

रमाशंकर यादव विद्रोही

हाथ और साथ का फ़र्क़

जावेद आलम ख़ान

लेख

अनीता वर्मा

हाशिए के लोग

जावेद आलम ख़ान

अस्मिता

ज़ुबैर सैफ़ी

अम्मी

अनस ख़ान

वे

अनस ख़ान

देश

तरुण भारतीय

हलफ़नामा

असद ज़ैदी

डॉल्टनगंज के मुसलमान

विशाल श्रीवास्तव

इस्लामाबाद

असद ज़ैदी

पूरब दिशा

असद ज़ैदी

बजरडीहा

अरमान आनंद

निज़ामुद्दीन

देवी प्रसाद मिश्र

आहत विश्वास

जावेद आलम ख़ान

शब्द मुसलमान

उमा शंकर चौधरी

मीलाद

जावेद आलम ख़ान

अनचीन्ही पहचान

जावेद आलम ख़ान

मान-अपमान

अरुण आदित्य

वह बूढ़ा मुसलमान

अशोक वाजपेयी

अकेला घर हुसैन का

निलय उपाध्याय

बड़ी-बी

अनिरुद्ध उमट

यूँ होता

फ़िरोज़ ख़ान

कोई तो काग़ज़ होगा

सौम्य मालवीय

ख़तरा है

सौम्य मालवीय

घर बेचना है

नवनीत पांडे

शाहिद

अनुज लुगुन

हैदराबाद

अमिताभ

अली मियाँ

अनिरुद्ध उमट

उदास औरतों की गली

गुलज़ार हुसैन

अच्छा मुसलमान

रामकुमार कृषक

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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