पर्वत पर बेला
पर्वत भू-दृश्य भारतभूमि
की प्रमुख स्थलाकृतिक विशेषताओं में से एक है जो न केवल स्थानीय जीवन और संस्कृति पर अपना विशिष्ट प्रभाव रखता है, बल्कि समग्र रूप से भारत के सांस्कृतिक अनुभवों में भी अपना योगदान करता है। इस चयन में पर्वत-पहाड़ विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।
23 सितम्बर 2026
घाम-पानी : नाम्चे बाज़ार का जादुई शनिवार
मैं नाम्चे बाज़ार में हूँ... क्यों हूँ! यह बताने के मायने कुछ नहीं निकलेंगे। बस इतना ही कहना काफ़ी होगा कि मैं नाम्चे बाज़ार में हूँ... क्योंकि मुझे यहाँ होना होगा। ठीक वैसे ही जैसे ‘Yesterday’ फ़िल्
मुकेश पांडेय की फ़िल्म ‘डॉटर ऑफ़ द माउंटेन्स’ को ‘इंडियन इंडिपेंडेंट फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ में सम्मान
उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ों में रहने वाली महिलाओं के मौन संघर्ष, अकेलेपन और साहस की कहानी कहती स्वतंत्र फ़िल्म ‘डॉटर ऑफ़ द माउंटेन्स’ (Daughter of the Mountains) को ‘इंडियन इंडिपेंडेंट फ़िल्म फ़ेस्टि
निम्स दाई! हिमाल आपको बुला रहे हैं...
Giving up is not in the blood, Sir! Not in the blood. — Nirmal ‘Nimsdai’ Purja 30 जुलाई 2026 | दिल्ली/काराकोरम उस दिन दिल्ली मेट्रो से दफ़्तर जाते हुए, मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था कि इस समय निर्म
दोस्तों को कभी न भेजी गई एक चिट्ठी
क़रीब-क़रीब सात बजे शाम का समय रहा होगा। मैं यूँ ही फ़ोन हाथ में लिए घर की छत पर बैठा था। अचानक से फ़ोन बजा, वीडियो कॉल वह भी। ‘स्कूल फ़्रेंड’ के नाम से एक व्हाट्सएप्प ग्रुप। मैंने कॉल रिसीव किया तो दे
रागदर्पण : उस जादुई शाम के नाम
अपने हालिया सफ़र के बाद, मैं पूरे यक़ीन के साथ कह सकती हूँ कि मैंने अपने अब तक के जीवन की सबसे करामाती शाम को देखा है। बुलंद बर्फ़-पोश पहाड़ियों के पीछे पश्चिम में दहककर बुझता हुआ लाल अलाव। वह दृश्य मेरे
ऋषिकेश : नदी के नगर का नागरिक होना
शहर हम में उतने ही होते हैं, जितने हम शहर में होते हैं। ऋषिकेश मेरे लिए वक़्त का एक हिस्सा है। इसकी सड़कों, गलियों, घाटों और मंदिरों को थोड़ा जिया है। जीते हुए जो महसूस होता है, वही तो जीवन का अनुभव
पहाड़ों की होली : रंग नहीं थे, रंगीनियाँ पूरी थीं
मेरे पास होली की स्मृतियों में रंगों की कोई स्मृति नहीं है। शोर में डूबे इस शहर में जब रंगों में डूबी हुई होली देखता हूँ, तो सोचता हूँ कि कितनी बेरंग थी मेरे बचपन की होली। थोड़ी बहुत जो स्मृतियाँ हैं
हिमाचल के दुर्लभ कठार और पेछियों के ख़ाली पेट
हिमाचली गाँवों में एक समय था, जब पेछियों के पेट साल भरे-भरे रहते थे। उस समय जब कोई बच्चा ज़्यादा खाता था—तो उसे एक विशेषण से नवाज़ा जाता था कि इसका पेट तो पेछी है, जो कभी भरता ही नहीं। आज यह विशेषण भ