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चाँदनी पर उद्धरण

चाँदनी चाँद की रोशनी

है जो उसके रूप-अर्थ का विस्तार करती हुई काव्य-अभिव्यक्ति में उतरती रही है।

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पूर्णचंद्र के आलोक को परास्त कर पर्वत के ऊपर तारागण चमकते रहते हैं। उसका रूप देखने में ही तो आनंद है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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'चंद्रोदय देखकर' अहा कितना सुंदर है, ऐसा कहने वाले लोग कम ही हैं, किंतु, उन सभी को चाँद की माधुरी नहीं मिल पाती है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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चाँद के पास ऐसा कोई दिव्य रसायन है, ऐसा कोई जामन है, जिससे वह धूप को चाँदनी में रूपांतरित कर देता है। बेचारा सूर्य! उसके पास ऐसा कोई जामन नहीं।

अमृतलाल वेगड़
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यह कितनी अजीब बात है कि चाँद का प्रकाश उसकी अपनी चीज़ नहीं। सूरज की धूप ही चाँद के धरातल से टकराकर चाँदनी बन जाती है।

अमृतलाल वेगड़
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धूप का चाँदनी में तो अनुवाद हो सकता है, पर चाँदनी का धूप में नहीं। वैसे ही, जैसे दूध से दही तो बन सकता है, पर दही से दूध नहीं।

अमृतलाल वेगड़

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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