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घास पर उद्धरण

प्रकृति, उर्वरता-अनुर्वरता,

जिजीविषा आदि विभिन्न प्रतीकों के रूप में घास कविता में उगती रही है।

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अग्नि की महिमा इसी में मानी जाती है कि वह समुद्र में भी वैसे ही प्रज्वलित हो जैसे सूखी घास में।

कालिदास
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वायु धुएँ को भले ही उड़ा दे परंतु जहाँ भी घास-फूँस हो, अग्नि तो वहाँ पहुँच ही जाती है।

कालिदास
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जिस मनुष्य के हाथ में क्षमारूपी शस्त्र हो, उसका दुष्ट क्या बिगाड़ सकता है? यदि दावाग्नि में तृण पड़े, तो वह स्वयं ही बुझ जाती है।

संत तुकाराम
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हे राजिया! यदि सिंह मर भी जाए तो भी वह मिट्टी या घास नहीं खाता।

कृपाराम खिड़िया
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