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शहर पर ग़ज़लें

शहर आधुनिक जीवन की आस्थाओं

के केंद्र बन गए हैं, जिनसे आबादी की उम्मीदें बढ़ती ही जा रही हैं। इस चयन में शामिल कविताओं में शहर की आवाजाही कभी स्वप्न और स्मृति तो कभी मोहभंग के रूप में दर्ज हुई है।

कहे के रहत बानी

मिथिलेश ‘गहमरी’

चाल देशी ना

जौहर शफियाबादी

खूब शहर में गस्ती बा

रमाकान्त मुकुल

काहे उनका अभी

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

घर अन्हरिया के सुरूज

मिथिलेश ‘गहमरी’

बस नजाकत, तकल्लुफ

गहबर गोवर्द्धन

ये शहर

डॉ. वेद मित्र शुक्ल

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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