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मेरी साहित्यिक तीर्थ-यात्रा

meri sahityik teerth yatra

राजबहादुर लमगोड़ा

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राजबहादुर लमगोड़ा

मेरी साहित्यिक तीर्थ-यात्रा

राजबहादुर लमगोड़ा

और अधिकराजबहादुर लमगोड़ा

    हिंदी के साहित्यिक क्षेत्र में आचार्य पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी का व्यक्तित्व महान् व्यक्तित्व है। नई हिंदी के निर्माण में भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद द्विवेदी जी का नाम बिना किसी पसोपेश के लिया जा सकता है। आज-कल के किसी भी प्रसिद्ध हिंदी-कवि या लेखक की जीवनी देखिए तो आपको उसके साहित्यिक विकास में श्री द्विवेदी जी का हाथ निश्चय ही दिखेगा। स्वर्गीय गणेशशंकर विद्याथों ठीक ही कहते थे कि वे केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि साहित्यकारों के निर्माता भी है। इसका अनुभव मुझे भी है। लगभग दस साल हुए, उन्होंने बिना किसी पूर्वपरिचय के मेरे यहाँ पधारने की कृपा की और मेरी रामायणी व्याख्यायों के विषय में वे शिक्षाएँ दी जिनका उल्लेख मैंने 'कल्याण' में प्रकाशित अपनी लेख-माला के प्रारंभ में किया है। उनके तीन उत्साहमद कृपा-पत्रों को अपनी जान से भी बढ़कर समझते हुए सुरक्षित किए हुए हैं, जिन्हें मैं अपनी विश्व विद्यालयवाली डिग्रियों से भी अधिक आदर की दृष्टि से देखता है। वस्तुतः आचार्य का गुण ही यह है कि वह औरों को भी साहित्यकार बना सके। पर समय की प्रगति देखिए कि अभी हाल में हिंदू-विश्वविद्यालय तथा प्रयाग विश्वविद्यालय ने 'डॉक्टर' की डिग्रियाँ बड़ी उदारता एवं प्रचुरता से बाँटी, पर आचार्य जैसे सबसे बड़े अधिकारी को किसी ने पूछा! सच पूछिए तो ऐसे महान व्यक्ति को 'डॉक्टर' बनाना स्वयं विश्व-विद्यालय की महत्ता का हेतु हो सकता है। यों तो आचार्य जी के विचार विचित्र है। कई वर्ष हुए, मैंने इस बारे में एक लेख लिखा था।

    जब वे मेरे यहाँ पधारे तब कहा कि मुझे तुम्हारा लेख देखकर दुख हुआ। यह आंग्ल शिक्षा का प्रभाव है कि तुम भी 'डॉक्टर' को 'आचार्य' से बेहतर समझते हो। भई! मेरी राय में तो मेरी साहित्य-सेवा के बदले में जो उपाधि तुम जैसे साहित्यकारों ने मुझे दे डाली है यह विश्वविद्यालयों की बनावटी डिग्रियों से अधिक प्रिय है।

    जभी से यह इरादा था कि में आचार्य जी के आश्रम (दौलतपुर, ज़िला रायबरेली) में स्वयं जाकर मुलाक़ात की वापसी का नैतिक कर्तव्य पूरा करूँ। पर हूँ गृहस्थी के तेली का बैल, जो अपने कोल्हू के गिर्द ही घूमता रहता है। फिर बीमारी से और भी मजबूर कर दिया। तीन वर्ष हुए कि एक बार तो सब लोग मेरी ज़िंदगी से ही निराश हो बैठे थे। अब स्वास्थ्य की दशा कहने योग्य है—न सर्दी की बर्दाश्त, गर्मी की। अस्तु, मामला टलता ही रहा। हाल में मेरे सहकारी श्री इक़बाल वर्मा 'सेहर' के आग्रह पर में इस साहित्यिक तीर्थ-यात्रा के लिए तैयार हो गया। पर शुभ कार्य में बाधा भी होती है। दो-चार दिन पहले से 'सेहर' जी की कमर और पैर में दर्द पैदा हो गया और हमारी आशाओं पर फिर पानी फिरता हुआ दिखाई दिया। पर सेहर जी हिम्मत हारे और वैसी दशा में भी तैयार हो गए। हम लोग 15 अप्रैल 38 को 4 ½ बजे सुबह फ़तेहपुर से इक्के पर चल दिए।

    वह समय बड़ा सुहावना था। चार-पाँच कोस तक उसका आनंद उठाते और वसंत ऋतु की बढ़िया हवा खाते एक निमग्नता की-सी दशा में हम लोग चले गए। मेरे मस्तिष्क में वे विचार रहे थे जिन्होंने वैदिक ऋषियों को उषा की प्रशंसा में तल्लीन कर दिया था। एक सुंदर कुमारी लाल ओढ़नी ओढ़े पूर्वी क्षितिज में अपनी सौंदर्य-छटा छिटका रही थी। आगे बढ़कर जब ग्रैंडट्रंक रोड छोड़ी तब यह भूल गए। कुछ चक्कर काटते हुए लहँगी मौज़ा (जहाँ घाट से गंगा पार करनी पड़ती है) के क़रीब पहुँचे तब एक भलेमानस ने ठीक राह बताई। हमने किसी तरह वहाँ पहुँचकर ठाकुर चंद्रराल सिंह मुख़्तार के घर पर इक्का खड़ा किया। उनके पक्के और सुडौल कमरे पर कांग्रेस का तिरंगा झंडा लहराता हुआ बहुत भला लगता था। अतिथी-सरकार की पुरानी बात यहाँ अब भी मौजूद थी। इक्का नहीं छोड़ा और हम लोग गंगा-पार जाने को रवाना हो गए। पहले एक सोता मिला, जो किसी छोटी नदी से कम था—जाँघों के ऊपर तक पानी और किसी डोंगी का पता नहीं। ठाकुर साहब के चचा राह दिखाने को साथ थे। हमने डोंगी की बात कही तब हँसकर बोले—बाबू जी, हम गँवार आदमी हैं सही, पर दुनिया में पहले चार तरह के लोग थे। एक जोड़ा ईमान अली और बरकत अली का जो सगे भाई थे। दूसरा वैसा ही जोड़ा बेईमान अली और मतलब अली का। पहले ईमान अली का स्वर्गवास हुआ और उनके रहने पर बरकत अली भी चल बसे। अब बाक़ी दोनों रह गए हैं। घाट के ठेकेदार को अपने मतलब से मतलब। मुसाफ़िरों को तकलीफ़ हो या आराम। अस्तु किसी प्रकार 2 ½ मील रेत और कटरी चलकर घाट पर पहुँचे। वहाँ एक मल्लाह और एक नाव थी। निख़नामे की तख़्ती, मुसाफ़िरों के आराम की जगह! पार होते-होते धूप बढ़ गई। किनारे की एक कुरिया में जाना चाहा तथ फेक्ट ने मना किया कि यहाँ पशु बाँचे जाते हैं। इसने तपती हुई धूप में नाव पर ही बैठ कर खाना खाया। वहाँ कोई ज़िम्मेवार आदमी था, अतः उतराई भी दूनी ली गई और कष्ट भी हुआ। हम फिर चल पड़े। दुपहर होती जा रही थी और अभी ढाई-तीन मील चलकर दौलतपुर पहुँचना था। बेचारे सेहर जी की पीड़ा की तकलीफ़ और शिकायत अलग थी। मेरा उत्तर था कि भई, यदि तीर्थ-यात्रा में कष्ट हो तो फिर लुत्फ़ ही क्या? वही कष्ट तो हमारे भावों का परीक्षक है!

    हम 12 बजते-बजते द्विवेदी जी के घर पर पहुँचे। बाहर नीम की घनी छाया थी। मुझे तो ऐसा जान पड़ा कि किसी वानप्रस्थी के आश्रम में गए हैं। दो मकान बराबर-बराबर थे। ईंटें लाल रंगी हुई और उनके गिर्द सफ़ेद टीप थी। मुझे तो पुरानी चित्रकारी का मज़ा गया, जिसमें ईंटें सुंदरता से पृथक-पृथक् दिखाई जाती थीं। सफ़ाई ऐसी थी कि कहीं तिनके का पता नहीं था। लाइब्रेरी में 10 अलमारियाँ पुस्तकों से ठसाठस भरी हुई थी, परंतु गर्द-ग़ुबार से साफ़ और तरतीब से चुनी हुई थीं। एक अँग्रेज़ का कथन याद गया कि कवि या लेखक का पहले अपना ही जीवन सुखंगठित करना चाहिए। अंदर जाकर प्रणाम किया और चरण हुए। वयोवृद्ध आचार्य ने उठकर प्रेम और प्रसन्नता से पीठ पर हाथ फेरा। इसमें यात्रा के सारे कष्ट भूल गए।

    उनकी हास्यप्रियता बराबर बनी हुई है। खाने का सवाल हुआ और जब हमने कहा कि खाना ती गंगास्नान कर वहीं खा चुके हैं तब हँसकर बोले कि क्या फ़कीर की मेहमानदारी पर भरोसा था। अच्छा यह बताओ कि हमारे लिए भी बचाया कि सब खा गए। मेरा उत्तर था कि देवता के नैवेध का सामान अलग है। द्विवेदी जी फिर हँसे और हमसे बग़लवाले मेहमान-घर में जाकर आराम करने के कहा। इस घर की सफ़ाई और सादगी ने भी मुझ-से बे-परवा और बे-तरतीब आदमी को मोहित कर लिया, पर सेहर जी तो यही कह रहे थे कि मैं भी अपने हथगाँव (ज़िला फ़तेहपुर) के घर के उपरी हिस्से पर जहाँ मैं रहता हूँ, प्रायः ऐसी ही सफ़ाई और तरतीब रखने की कोशिश करता हूँ। मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि आख़िर तुम भी तो कवि हो। अस्तु, हम इतना थक गए थे कि शीघ्र ही से गए और पाँच बजे शाम से पहले उठ सके।

    उठकर आए तब द्विवेदी की कमरे में गाँव की सरकारी पंचायत हो रही थी। द्विवेदी जी सरपंच है। केई मामला पेश था। हमें दिलचस्पी थी, अतः अलग बैठे देखते रहे। मैं सोच रहा था कि जीवन का आदर्श यहाँ भी वही है जो शेक्सपियर का था कि जब साहित्यिक जीवन से अवकाश मिला तब अपने छोटे से गाँव की ही शरण ली और उसी की सेवा करना अपना फ़र्ज़ समझा। इतने में पंचायत ख़त्म हुई। लोग जाने लगे। एक साधारण देहाती से द्विवेदी जी को यह कहते सुना कि भई, तुम आज मुझसे नाराज़ तो नहीं हो गए? बड़े-छोटे का कृत्रिम विभाग तो वहाँ जान ही पड़ता था। इन्हीं विचारों के सन्नाटे में मैंने द्विवेदी जी को मुबारक़बाद दी कि आप धन्य है जो इस 76 वर्ष की आयु में भी अपने ग्राम-सुधार के काम में इतनी दिलचसी लेते हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हाँ भई, यहाँ स्कूल और डाक घर खुलवाया। औषधालय भी है और पंचायत और मवेशीख़ाना भी। पर जानते हो कि इन सेवाओं के बदले मुझे क्या उपनाम मिला है। मैंने कहा कि आपके सभी प्रशंसक ही होंगे और शायद मेरे मुँह से ‘ग्रामसेवक’ शब्द निकलना चाहता था कि वे बोल उठे—भई! देहाती ज़िंदगी उतनी साफ़-सुथरी नहीं है जितना तुम शहरवाले समझते हो। यहाँ ईर्ष्या और पार्टी बंद का बाज़ार गर्म है। मुझे जो उपनाम मिला है वह है ‘दुबौना...’। आह! मेरा वह सब ख़याल ख़्वाब हो गया और मनुष्य अपनी सारी स्वार्थपरता लिए हुए सामने गया। बर्नार्ड शा की बात याद आई कि इस समय आज़ादी के मानी यह है कि हम तो जो चाहें वह करें, पर औरों को आज़ादी हो। द्विवेदी जी ने कहा—भई, पंचायत से अब किसी को वैसे अत्याचार का मौक़ा नहीं मिलता और मवेशीख़ाने से औरों के खेत चरा लेने की आज़ादी कहाँ? मैंने हँसकर कहा कि द्विवेदी जी, पहले लोगों ने ईर्ष्या से ही हरिश्चंद्र को ‘भारतेंदु’ कहना शुरू किया था। वे बोले—नहीं भई, यह गाड़ी कमाई है। इसे कैसे खोऊँगा? लमगोड़ा जी, जो काम करता हूँ, इच्छा यही रहती है कि संपूर्ण हो। वकील की मदद तो मिलती नहीं, क्योंकि पंचायत-क़ानून में वकील की इजाज़त ही नहीं है। परंतु देखिए मेरी अलमारी में फ़ौजदारी और दीवानी की पुस्तकें मौजूद हैं। यहाँ छोटे-मोटे मुख़्तारों को इजाज़त होती तो अच्छा था। मैंने हँसकर कहा—द्विवेदी जी, काटजू साहब तो ख़ुद वकील होकर वकीलों हस्ती ही मिटा देना चाहतें हैं। उत्तर मिला—यह ग़लती है।

    द्विवेदी जी के घर के सामने एक सुंदर तिदरी है, जिस पर बेल-बूटे बने हुए हैं। कुछ संस्कृत-श्लोक भी लिखे हैं। उन्होंने कहा—वह देखो मेरा ख़ब्त! अपनी स्त्री कस स्मारक में ग़रीबी का इतना पैसा ख़र्च कर दिया। एक ओर सरस्वती, दूसरी ओर लक्ष्मी और बीच में धर्मपत्नी जी की मूर्ति है। लक्ष्मी का उपासक मैं कभी नहीं था। 200 मासिक से अधिक की नौकरी छोड़कर 23 मासिक पर ‘सरस्वती’ के संपादक होना स्वीकार किया। धर्मपत्नी को ऐसा दुःख हुआ था कि दो दिन खाना खाया कहा। हाँ, मैंने सरस्वती की आराधना अवश्य की भई, यह ख़ब्त है। तुमने मुझसा ख़ब्ती और कहीं देखा है? मेरी आँखों में आँसू गए। मैंने कहा—आचार्य वर, शाहजहाँ भी ऐसा ही ख़ब्ती था। उसने मृत्यु पर प्रेम को विजयी बनाने के लिए ही ‘ताजमहल’ की तैयारी में कितना रुपया लगा दिया। द्विवेदी भी हँस दिए और बोले—एक बात और देखी है कि हातेवाले जँगले में ताला क्यों पड़ा है। मैंने प्रश्नात्मक दृष्टि डाली। वे बोले—आह, दुनिया मुहब्बत की क़द्र क्या जाने? लोगों ने यह कहना शुरू किया कि 'दुबौना' अपनी स्त्री को देवी बनाकर पुजना चाहता है। इसीलिए मैंने ताला डाल रखा है। मैं सोचने लगा कि संसार की दृष्टि कितनी संकीर्ण है, पर साथ ही इस शुद्ध सुंदरता के उपासक के दिल का नक़्शा भी सामने गया। आचार्य जी की 42 वर्ष की आयु में धर्मपत्नी का स्वर्गवास हुआ था। अब वह आयु 75-76 वर्ष है। मानो बीच के सारे वर्ष इसी प्रेम-निर्वाह के भावों पर निछावर कर दिए गए। मुझे तो हर तरफ़ आचार्य जी की साहित्यिक सरलता की ही छटा देख पड़ी, जो प्रेम एवं सौंदर्य के प्रभावों से परिपूर्ण थी। कृत्रिमता का कहीं लेश नहीं था।

    सेहर जी ने अपनी नई पुस्तक 'रुबाइयात-ख़ैयाम' के पद्यबद्ध अनुवाद की एक प्रति आचार्य जी को भेंट की थी। कहते थे कि बच्चों को यह पुस्तक बहुत पसंद आई। छपाई आदि तो इंडियन-प्रेस की विशेषता भी अच्छा है। अनुवाद भी अच्छा है। फ़ारसी-कवि के भावों को बड़ी सादगी और सफ़ाई से पेश किया है।

    मेरे रामायणी लेखों के बारे में उन्हें यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि उन्हें पुस्तकरूप में छापने का कोई प्रकाशक तैयार नहीं, और हिंदी मासिक भी खोज-संबंधी लेखों को छापने से प्रायः हिचकते हैं। बोले—हिंदी ने ऐसे लेखों का आदर करना अभी नहीं सीखा। वहाँ ग्राहक की अधिक चिंता है। परंतु यदि हिंदी मासिक 5 प्रतिशत पृष्ठ भी ऐसे लेखों के लिए अलग नहीं करेंगे तो साहित्यिक खोज का क्या हाल होगा?

    हमें यह सुनकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि आचार्य जी 'हिंदुस्तानी एकाडमी' के सदस्य नहीं है। पूछने पर कहा—भई, कॉन्फ़्रेंस का हाल 'लीडर' में पढ़ लेता हूँ। मुझे तो बुलावा भी नहीं आता। यहाँ तो पड़ों की पूँछ है। मैं कोई 'डॉक्टर' थोड़ा हूँ। मैं तो हूँ हिंदी का एक ग्रामीण सेवक और वह है 'एकाडमी'!

    द्विवेदी जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं। नींद आने को बड़ी शिकायत है। शाम से ही सो जाने की कोशिश करते हैं। उस दिन भी वे 8 बजे रात के क़रीब हम लोगों से क्षमा-प्रार्थना कर भीतर चले गए। तब उनके भानजे पंडित कमलाकिशोर त्रिपाठी से बातें होने लगीं। यही द्विवेदी जी के अकेले वारिस हैं—नवयुवक, सुंदर, सरल और सुशील। उनके अतिथि सत्कार का क्या कहना? हर काम को नौकर से पहले करना चाहते थे। 'होमियों पैथी? से जनता की सेवा करते रहते हैं, जिसमें उन्हें दिन-रात का ख़याल नहीं रहता।

    हम लोग दूसरे ही दिन सवेरे बैलगाड़ी से वापस हुए। फिर वही वसंतऋतु का मनोमोहक दृश्य था और वही सुगंधित वायु के शीतल झकोरे। मैं गुनगुना रहा था—

    पंछी बोलन लगे राह चलन लागी राम-नाम की बेरा,

    सबेरे उठो!

    बैल चढ़े भोला डमरू बजावैं आगे गौरादेई का डोला,

    सवेरे उठो!

    गंगा की कटरी गई। वहाँ गाड़ी की कोई राह तक नहीं। झाऊ की झाड़ियों में ऊँची-नीची ज़मीन को पार करते और घट के ठेकेदार को कोसते चले जाते थे। यदि कुछ झाऊ काट डाली जाती तो क्या सौ-दो सौ का ख़र्च था? फिर गाड़ियों की लीक आप ही बन जाती। लौटते समय भी घाट पर कोई ज़िम्मेवार आदमी था, जिससे कुछ कहा जाता। घाट और रास्ता कुछ बेहतर हो सकता है और होना चाहिए, क्योंकि आचार्य जी के दर्शनार्थ बहुधा बड़े-बड़े कवि और लेखक इधर आया ही करते हैं और यही मुक़ाम यानी लहँगी-घाट दौलतपुर के सबसे ज़्यादा नज़दीक है। अभी कुछ ही दिन पूर्व थी मैथिलीशरण गुप्त और पंडित दुलारेलाल भार्गव वहाँ गए थे।

    वापसी में ठाकुर चंद्रपालसिंह मुख़्तार के पिता दास जी ने खाने का सामान कर रखा था। हम लोग घाट किनारे ही नहाकर द्विवेदी जी के घर का 'प्रसाद' खाने गए थे पर ठाकुर साहब किसी तरह माने। उन्होंने घर के घी की बनी हुई गर्म पूरियाँ और घर के शुद्ध देसी घी में वह मज़ा आया कि जी तृप्त हो गया। लौटते हुए लोग कल्यानपुर होकर आए, जो गैंड-ट्रंक रोड लहँगी-घाट से 2 मील पर है और जहाँ से कंसपुर-गुगौली ई. आई. आर. लगभग मील भर होगा। धूप बड़ी तेज़ हो गई थी। राह में एक बरौरा नामक गाँव है, जहाँ सड़क के किनारे कुएँ पर एक जनेउधारी महाशय पानी खींच रहे थे। सेहर जी ने जाकर पानी पिला देने को कहा। पर ये 'हम पानी नहीं दे सकते' कहकर तर्पण में लग गए। यह देखकर दुःख हुआ कि वे गर्मी में एक प्यासे मनुष्य को पानी पिलाने की अपेक्षा एक अदृश्य अस्तित्व के तर्पण में पानी लुढ़काना अधिक आवश्यक समझते थे! परंतु उसी समय कुएँ पर खड़े हुए एक दूसरे ग़रीब देहाती ने अपना भरा हुआ डोल आगे बढ़ा दिया। हम लोगों ने पानी पिया और यह सोचते हुए चल दिए कि देवता के निकट वह तर्पण अधिक स्वीकृत होने योग्य था या वह मानवोचित कार्य जिसने दो तृप्त मनुष्यों से तृप्ति और शांति दी। स्मरण रहे कि मैं स्वयं सनातनधर्मी हूँ और दैनिक तर्पण करने का आदी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सचित्र मासिक पत्रिका भाग-39, खंड 2 (पृष्ठ 31)
    • रचनाकार : राजबहादुर लमगोड़ा
    • प्रकाशन : इंडियन प्रेस
    • संस्करण : 1939

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