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रसखान

1548 - 1628 | हरदोई, उत्तर प्रदेश

कृष्ण-भक्त कवि। भावों की सरस अभिव्यक्ति के लिए ‘रस की खान’ कहे गए। सवैयों के लिए स्मरणीय।

कृष्ण-भक्त कवि। भावों की सरस अभिव्यक्ति के लिए ‘रस की खान’ कहे गए। सवैयों के लिए स्मरणीय।

रसखान की संपूर्ण रचनाएँ

दोहा 14

प्रेम प्रेम सब कोउ कहै, कठिन प्रेम की फाँस।

प्रान तरफि निकरै नहीं, केवल चलत उसाँस॥

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प्रेम हरी को रूप है, त्यौं हरि प्रेम स्वरूप।

एक होइ द्वै यो लसै, ज्यौं सूरज अरु धूप॥

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अति सूक्षम कोमल अतिहि, अति पतरो अति दूर।

प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर॥

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इक अगी बिनु कारनहिं, इक रस सदा समान।

गनै प्रियहि सर्वस्व जो, सोई प्रेम प्रमान॥

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पै मिठास या मार के, रोम-रोम भरपूर।

मरत जियै झुकतौ थिरै, बनै सु चकनाचूर॥

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पद 1

 

सवैया 60

सोरठा 3

 

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