निपट निरंजन की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 5
मुह देखे का प्यार है, देखा सब संसार।
पैसे दमरी पर मरे, स्वार्थी सब व्यवहार॥
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ना देवल में देव है, ना मसज़िद खुदाय।
बांग देत सुनता नहीं, ना घंटी के बजाय॥
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मन की ममता ना गई, नीच न छोड़े चाल।
रुका सुखा जो मिले, ले झोली में डाल॥
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जब हम होते तू नहीं, अब तू है हम नाहीं।
जल की लहर जल में रहे जल केवल नाहीं॥
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जहाँ पवन की गती नहीं, रवि शशी उदय न होय।
जो फल ब्रह्मा नहीं रच्यो, निपट मांगत सोय॥
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