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Manu

کی

باعتبار

जिस कुल में पति पत्नी से और पत्नी पति से संतुष्ट रहती है, वहाँ ध्रुव कल्याण वास करता हैं।

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देवों के समक्ष की हुई प्रतिज्ञा के द्वारा पुरुष स्त्री के साथ विवाह करता है, स्वेच्छा से नहीं। अतएव देवों की प्रीति के लिए स्त्री का नित्य भरण पोषण करना चाहिए।

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स्त्री की प्रसन्नता से सारा परिवार प्रसन्न रहता है। उसके असंतोष से कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

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अनेक कल्याणों की भाजन स्त्रियाँ पूजा के योग्य है, ये घर की ज्योति हैं, प्रजापति ने प्रजोत्पत्ति के लिए उन्हें बनाया है। स्त्रियाँ घरों में साक्षात् लक्ष्मी है, दोनों में कोई अंतर नहीं है।

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जो पुरुष यत्नपूर्व स्त्री की रक्षा करता है, वह अपनी संतान, चरित्र, परिवार, धर्म और अपने आपकी रक्षा करता है।

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जहाँ स्त्रियों का पूजन होता है, वहाँ देवता बसते हैं। जहाँ इनका आदर नहीं होता, वहाँ सब क्रियाएँ निष्फल जाती है।

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संतति को जन्म देना, उत्पन्न हुए पुत्रादिक का पालन करना, और प्रतिदिन की लोकयात्रा (भोजन आदि का प्रबंध) का एकमात्र प्रत्यक्ष कारण स्त्री ही है।

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अपत्य, धर्मकार्य, उत्तम आनंद और अपनी तथा अपने पूर्व पुरुषों की स्वर्गगति—सब कुछ स्त्री के अधीन है।

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मन, वाणी और शरीर से संयत रहकर जो स्त्री पति के अनुकूल रहती है, वह इस लोक में साध्वी स्त्रियों का यश पाती है और मरने के उपरांत पति लोक में जाती है।

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स्त्रियों के लिए पृथक् यज्ञ, व्रत या उपवास का विधान नहीं है। पति को शुश्रूषा से ही वे स्वर्ग में उच्च स्थान पाती है।

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मंत्र के साथ होने वाले संस्कार से प्राप्त हुआ पति, इस लोक में और परलोक में भी स्त्री को नित्य सुख का देनेवाला है।

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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