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वास्तविक सत्य यह है कि नाटक की कला में कभी कोई एक सत्य जैसी चीज़ नहीं रही है।
एक नागरिक के तौर पर मैं यह ज़रूर पूछूँगा कि सत्य क्या है? ग़लत क्या है?
यथार्थ क्या है और अयथार्थ क्या है–इसका कोई स्पष्ट भेद नहीं रहा है और न ही सच्च व झूठ में कोई अंतर रहा है।
एक लेखक की ज़िंदगी अत्यंत प्रहार्य होती है, लगभग आवरणविहीन गतिविधि। हमें उसको लेकर रोने की ज़रूरत नहीं है। लेखक अपना चुनाव करता है और उस पर टिका रहता है। लेकिन यह कहना सही होगा कि आप सभी तरह की हवाओं के लिए खुले हैं और इनमें से कुछ निश्चय ही बर्फ़ानी होती हैं। आप अपने बूते बाहर निकलते हैं, अपने हाथ-पैरों (लिंब) पर। आपको कोई आड़, कोई सुरक्षा नहीं मिलती-बशर्ते कि आप झूठ बोलें—इस मामले में भी आपने अपनी सुरक्षा स्वयं ही बनाई है और तर्क किया जा सकता है कि इस तरह आप राजनीतिक बन जाते हैं।
मैं सदा हर नाटक की शुरुआत पात्रों को अ ब स कह कर करता हूँ।
कोई ज़रूरी नहीं कि कोई चीज़ पूरी तरह सच या झूठ हो; यह सच और झूठ दोनों हो सकती है।
अधिसंख्य नाटक एक पंक्ति, एक शब्द या एक छवि (इमेज) से जन्म लेते हैं। इस शब्द के तत्काल बाद अकसर एक छवि उभरती है।
अमेरिका बिना किसी शंका के सबसे बड़ा तमाशा है। यह बर्बर, निर्मोही, घृणा से भरा और निर्मम हो सकता है पर यह अत्यंत चतुर भी है। एक सेल्समैन के तौर पर इसका ज़वाब नहीं है और इसकी सबसे बड़ी बिक्री की चीज़ इसका आत्म प्रेम है। यह विजेता है।