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अगर कविता न होती तो राम और कृष्ण भी यथार्थ न होते।
जितना कवि समय को, उतना ही समय कवि को गढ़ता है।
कविता परम सत्य और चरम असत्य के बीच गोधूलि की तरह विचरती है।
कविता सरलीकरण और सामान्यीकरण के विरुद्ध अथक सत्याग्रह है।
साहित्य, लालित्य के बचाव में प्रयत्नशील बने रहने की भी भूमि है।
कविता समाज नहीं, व्यक्ति लिखता है, फिर भी कविता एक सामाजिक कर्म है।
कविता का काम संसार के बिना नहीं चलता। वह उसका सत्यापन भी करती है और गुणगान भी।
कविता व्यक्ति को दूसरा बनाए जाने के क्रूर अमानवीय उपक्रम के विरुद्ध सविनय अवज्ञा है।
कविता यथार्थ का बिंब भर नहीं होती। वह उसमें कुछ जोड़ती, इज़ाफ़ा करती है।