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Ashok Vajpeyi

1941 | چھتیس گڑھ

کی

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अगर कविता होती तो राम और कृष्ण भी यथार्थ होते।

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जितना कवि समय को, उतना ही समय कवि को गढ़ता है।

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कविता परम सत्य और चरम असत्य के बीच गोधूलि की तरह विचरती है।

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कविता आत्म और पर के द्वैत को ध्वस्त करती है।

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शिल्प भाषा का अंतःकरण है।

कविता सरलीकरण और सामान्यीकरण के विरुद्ध अथक सत्याग्रह है।

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साहित्य, लालित्य के बचाव में प्रयत्नशील बने रहने की भी भूमि है।

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कविता एकांत देती है।

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कविता भाषा का भाषा में स्वराज है।

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कविता भाषा का शिल्पित रूप है, कच्चा रूप नहीं।

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कविता समाज नहीं, व्यक्ति लिखता है, फिर भी कविता एक सामाजिक कर्म है।

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कविता का काम संसार के बिना नहीं चलता। वह उसका सत्यापन भी करती है और गुणगान भी।

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कविता व्यक्ति को दूसरा बनाए जाने के क्रूर अमानवीय उपक्रम के विरुद्ध सविनय अवज्ञा है।

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कविता अपने सच पर ईमानदार शक करती है।

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कविता यथार्थ का बिंब भर नहीं होती। वह उसमें कुछ जोड़ती, इज़ाफ़ा करती है।

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कविता कवि, पाठक और श्रोता का साझा सच है।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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