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Ashok Vajpeyi

1941 | چھتیس گڑھ

تمام تمام

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अगर कविता होती तो राम और कृष्ण भी यथार्थ होते।

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जितना कवि समय को, उतना ही समय कवि को गढ़ता है।

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कविता आत्म और पर के द्वैत को ध्वस्त करती है।

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कविता परम सत्य और चरम असत्य के बीच गोधूलि की तरह विचरती है।

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शिल्प भाषा का अंतःकरण है।

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کتاب 3

 

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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