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अफ़्रीक़ा

afriqa

मिर्ज़ो तुर्सुनज़ादे

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और अधिकमिर्ज़ो तुर्सुनज़ादे

    सुंदर भव्य महान नाम अफ़्रीक़ा का

    किसने नहीं सुना है

    जो आबनूस-सा काला सुंदर

    पराधीनता की बेड़ी में

    जकड़ा कसकर

    भूख और संघर्षों से पीड़ित रहता है

    संतापित जर्जर है

    इस जीवन के राजमार्ग से बहुत दूर है

    ताड़ों से घिरे हुए जिसके बंदरगाहों पर

    नरभक्षी पश्चिमी तटों से

    जलपोतों ने आकर

    ज़िंदा शिकार की खोजें की

    विस्मयकारी धरती पर

    जिसका शरीर काली रजनी-सा

    दुष्कर्मी गोरों के हाथों

    लाल ख़ून से सना हुआ

    जिनकी भीड़ों ने

    अंग-अंग को कुचल दिया

    काले अफ़्रीक़ी जंगल में

    काला भ्रष्टाचार किया

    साल बीतते

    सदियाँ जातीं

    दाग़ रहे हैं पशु विदेशी

    देह समय की चाबुक से

    दास बनाया

    होठ सीं दिए

    आँसू निकल रहे ग़ुस्से में

    जलते आँसू

    मोती-से आँसू

    जंगल में

    हीरों की खानों में

    ग़म के आँसू

    मेरे साथी

    साफ़ कितनी मैंने तस्वीर बनाई

    तेरे सुदूर दक्षिण की

    भाव-प्रवण चेहरा तेरा भदरंग हो गया

    महामृत्यु की चीख़ों से

    भयभीत चंद्रमा खिसक गया

    मेघों के पीछे

    देख तुझे दिन-रात यंत्रणा पाते

    क्रोधित हैं सागर की लहरें

    उनके जघन्य कर्मों पर

    डूबा कितनी ही बार ग़ुलामों का ग़म

    इनमें आकर

    आज़ादी के लिए ज़ोर से

    देते हुए गुहार

    करते हुए निवेदन जाने अनजाने से

    दग्ध सहारा के दिल से

    आहों पर आहें निकलीं

    संतापित अरबों ने चाही

    अपनी करनी शांत पिपासा

    नील नदी से

    असह्य पिपासा

    मुक्ति पिपासा

    नीच विजेताओं से

    इस महाद्वीप को अलग कर दिया

    शेष विश्व से

    लोहे की दीवारों ने

    राष्ट्र स्वाभिमानी सब इसके

    भेज दिए काराओं में

    फिर भी हमने ऋतु वसंत में

    स्वागत किया

    ज़िंदा अफ़्रीक़ी—

    उड़कर आए हुए परिंदों—

    यानी अफ़्रीक़ी दूतों का

    जोकि हमारे बाग़ों में निज नीड़ बना

    विश्राम रहे करते सारी गरमी भर

    इस शोषण से मुक्त धरा पर

    जब ये दूत परिंदे

    हुए लौटने को घर

    हमने उनसे कहा वहाँ जा बतलाने को

    जो हम करते महसूस

    नरक में आहें भरते अफ़्रीक़ी की बावत

    गुज़र गईं सदियों पर सदियाँ

    करवट बदली आख़िर युग ने

    अफ़्रीक़ा में जागी फिर से

    आज़ादी की आशा

    ढहती हैं अब वे दीवारें

    काट रही थीं जो दुनिया से

    तौक़ ग़ुलामी का जल्दी फेंका जाएगा

    महिमा-मंडित मुक्ति-चेतना उदय हो रही

    हम सब अच्छी तरह जानते

    सम्प्रति अफ़्रीक़ा को

    नव जीवन पा गया वस्तुतः

    आज विश्व सब

    शोषण से पीड़ित धरती वह

    उठ आज रही

    कटिबद्ध मुक्ति के लिए

    संघर्ष कर रही

    आवाज़ दे रही

    उसके साथ

    धरा के सारे राष्ट्र

    ख़ुशी का अनुभव करते

    अफ़्रीक़ा की आज़ादी का

    जयघोष गुँजाते

    आरपार देशों के

    हाथ दोस्ती के उनके

    बढ़ रहे ख़ुशी से।

    स्रोत :
    • पुस्तक : एक सौ एक सोवियत कविताएँ (पृष्ठ 184)
    • रचनाकार : मिर्ज़ो तुर्सुनज़ादे
    • प्रकाशन : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली
    • संस्करण : 1975

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