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समझे जाने की चाह में

samjhe jane ki chah mein

श्रद्धा आढ़ा

अन्य

अन्य

श्रद्धा आढ़ा

समझे जाने की चाह में

श्रद्धा आढ़ा

और अधिकश्रद्धा आढ़ा

    विषय विषाद का ये भी होता है कि

    जिन्हें समझाने की सबसे अधिक होती है चाह

    विपरीत समझ जाते हैं वे ही अक्सर।

    ठीक होता है ग़ोता गहरे जल में लगाना।

    उथले पानी की थाह कोई थाह नहीं होती।

    खोखली ज़मीनों पर बने मकानों की

    लंबी मियाद नहीं होती।

    भरभराते कँगूरों की चमकती

    सूरत, किसी रोज़ का दिवास्वप्न रही हो शायद।

    है कटु, मगर सत्य है कि

    मस्तक भी उन्हीं के लिए क़लम करने की रहती लालसा है।

    जहाँ लग सकती हैं तोहमतें उसके टेढ़ा कटने की।

    प्रतीक भी कैसे चुने है हमने

    कि जहाँ कह सकें कि

    हाँ—“उन्होंने दिखाया था चीर कर हृदय, भक्ति

    योग्य नहीं अन्य कोई।

    जाने क्यों हममें था

    सामर्थ्य कि कह पाते आवाज़ बुलंद करके

    कि—“विश्वास को साक्ष्यों की दरकार नहीं होती,

    इम्तहानों की गर दरकार हो, यक़ीनन वहाँ।

    फिर कोई परीक्षा काम नहीं करती।”

    स्रोत :
    • पुस्तक : अभी सफ़र में हूँ (पृष्ठ 55)
    • रचनाकार : श्रद्धा आढ़ा
    • प्रकाशन : बोधि प्रकाशन
    • संस्करण : 2021

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