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कसक

kasak

कुमार विक्रमादित्य

अन्य

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और अधिककुमार विक्रमादित्य

    जब भी निकालता हूँ अपने म्यान से कलम

    रूक जाता हूँ कुछ सोचकर

    आस-पास देखता हूँ जब

    समस्याओं का अम्बार

    मुँह बाए ताकते उन चातकों को

    पूछता मुँह लटकाए अपनी भाव भंगिमा से

    जिसे व्यथा व्यक्त करने का तरीक़ा नहीं है पता

    पर उलझा संवेदनाओं के मकड़जाल में

    अट्टहास करता लाखों प्रश्न जो

    भोज पत्रों से उड़कर अब

    मिटटी में दफ़न हो गए हैं

    पर निकल आते हैं रह-रह कर

    व्यवस्था को थाहने

    जिसे वर्षों पहले

    किसी ने महसूसा था

    कलम चल पड़ी थी इस उम्मीद से कि

    क्रांति की चिंगारी इसी से उठेगी

    मगर उसे क्या पता कि

    दरबार का मालिक इतना कठोर होगा कि

    आवाज़ उठाने वाले को दफ़न होना पड़ेगा

    और कलम एक बार फिर

    म्यान में बंद होकर अंदर सुबकता रह जाएगा।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुमार विक्रमादित्य
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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