कहानी : नीली
आशीष कुमार शाह
19 सितम्बर 2026
पेपर ख़त्म होने के बाद मैं और मेरा दोस्त अपने हॉस्टल की ओर बढ़ रहे थे। पेपर के लिए जाते वक़्त सब कुछ अपनी व्यवस्थित स्थिति में क्रम से चल रहा था। लेकिन यह क्या, इतनी अफ़रा-तफ़री क्यों? लोग भाग-दौड़ क्यों कर रहे हैं? सड़कों पर इतनी भीड़ क्यों है? इतना लंबा ट्रैफ़िक? मैं अपने दोस्त की ओर और मेरा दोस्त मेरी ओर देखता रहा। कुछ समझ नहीं आया तो हम दोनों एक साथ ऑटोवाले भैया से पूछा—इतनी भाग-दौड़ क्यों हो रही है?
“अरे, तुम लोगों को पता नहीं? प्रधानमंत्री जी ने 22 मार्च से संपूर्ण लॉकडाउन का ऐलान कर दिया है। साथ ही यह भी कहा है कि कोरोनावायरस एक विशाल महामारी के रूप में विदेशों में फैल रहा है, इसलिए भारत में इसको रोकने के लिए हमें कड़े नियमों का पालन करना पड़ेगा। यह लॉकडाउन कितने दिन चलेगा, पता नहीं। सब लोग सामान ख़रीदकर घरों में रख लेने के लिए बाहर निकले हैं। दो दिन बाद सब कुछ बंद हो जाएगा। तुम लोग भी अपने घर निकल जाना।”—सूचनाओं के साथ भैया ने सुझाव भी पेश कर दिया था।
उसी दिन शाम को विश्वविद्यालय से नोटिस जारी हो गया कि आगे की परीक्षाएँ अनिश्चित समय के लिए स्थगित की जाती हैं। मैं नोटिस लेकर भागा-भागा बब्बन के पास पहुँचा। नोटिस दिखाते हुए कहा, “अब क्या करें?” बब्बन ने कहा, “टिकट करते हैं। घर चलेंगे।”
“दिल्ली से गाँव बहुत दूर है भाई, अभी कहाँ से टिकट मिलेगा?”
मैं और बब्बन बचपन से ही साथ में पढ़ रहे थे। स्कूल में हम दोनों के मार्क्स भी एक जैसे ही रहते थे। कभी बब्बन आगे निकल जाता था तो कभी मैं, ज़्यादातर बब्बन ही आगे रहता था। कॉलेज में दाख़िला लेने का निर्णय हुआ तो हम दोनों ने फिर एक ही रास्ता लिया—दिल्ली जाएँगे और आगे की पढ़ाई वहीं से करेंगे। दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन मेरिट के आधार पर होता था। चूँकि हम दोनों के मार्क्स बराबर थे, इसलिए हमारा एडमिशन भी दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक ही कॉलेज में हो गया। गणित में हम दोनों के सबसे अच्छे नंबर थे, तो गणित से बीएससी करना स्वाभाविक जान पड़ा।
दाख़िले के बाद कॉलेज गए, सिलेबस उठाया तो समझ आया कि दसवीं और बारहवीं की गणित और विश्वविद्यालय के गणित में बहुत अंतर है। अलजेब्रा और कैलकुलस मेरे सिर के ऊपर से जा रहे थे। मेरा इंटरेस्ट धीरे-धीरे कम होने लगा था। या यूँ कहें कि लाखों लोगों की तरह मुझ पर भी दिल्ली की हवाओं का जादू हो चुका था। पहले सेमेस्टर के अंत तक कक्षा में मेरी उपस्थिति आधी हो चुकी थी और अक्सर मैं नए-नए दोस्तों के साथ कैंपस में घूमते हुए पाया जाने लगा।
लेकिन बब्बन अभी भी उसी तरह का था। जैसे मॉडर्निटी का एंटीवायरस उसे मिल गया हो, जिसकी वजह से उस पर मॉडर्निटी का कोई असर नहीं हो रहा था। पढ़ाई के प्रति सीरियस नहीं होने के कारण बाहर का सारा काम मुझे ही करना पड़ता था, चाहे पानी का कैन उठाकर लाना हो, सब्ज़ी लाना हो, रूम साफ़ करना हो या फिर टिकट करना। लगभग सारे बाहरी काम मेरे ही ज़िम्मे थे।
घर तक जाने के लिए टिकट की ज़िम्मेदारी भी मेरे ऊपर थी। मैंने देखा, डायरेक्ट गाँव तक जाने वाली सारी ट्रेनें रद्द हो चुकी थीं। मैंने ट्रेन बदलकर जाने का फ़ैसला बब्बन को सुनाया तो बब्बन ने कहा, “अभी तो घर जाना है, बस कैसे भी।”
इसके बाद मैंने ग्वालियर से गाँव तक का टिकट किया और फिर हम ग्वालियर के लिए निकल पड़े। ग्वालियर से हमारी ट्रेन शाम में थी। अब अगली चुनौती शाम के पहले तक ग्वालियर पहुँचने की थी। हमने बोरिया-बिस्तर बाँधा और चल पड़े।
रेल के डिब्बे में मैं और बब्बन आमने-सामने बैठे थे। हमारे घर पहुँचने की संभावनाओं ने पंख फैलाया ही था कि मोबाइल पर मैसेज की एक आवाज़ ने उन पंखों को काट दिया। मैसेज में लिखा था—“Your train has been cancelled.”
जब मैंने मैसेज बब्बन को दिखाया तो उसने देखने के बाद कुछ नहीं कहा, बस ट्रेन की खिड़की से बाहर एकटक देखने लगा। मैंने कहा, “कोई बात नहीं, कोई और ट्रेन देख लेंगे।”
यह मैंने कह तो दिया था, लेकिन कोई और ट्रेन थी नहीं और आज शाम तक सब कुछ बंद हो जाएगा।
कुछ देर बाद बब्बन ने कहा, “लोग कह रहे थे यह लॉकडाउन बहुत लंबा चलेगा। ग्वालियर में हम कहाँ रुकेंगे? कोई तो नहीं है जान-पहचान वाला। क्या खाएँगे? साला, कोरोनावायरस से मरे न मरे, भूख से पहले मर जाएँगे।”
बब्बन के छोटे-छोटे वाक्य मेरी मजबूती के बाँध को तोड़ रहे थे, लेकिन ख़ुद को सँभालने के साथ बब्बन को भी सँभाल लेने के सिवा और कोई रास्ता नहीं था मेरे पास।
मैंने निर्णय लिया कि हम ग्वालियर न जाकर वापस दिल्ली लौट जाएँगे। अपने रूम में रहेंगे। चाहे जो खाएँ, जो करना पड़े, हम वापस जाएँगे दिल्ली। बब्बन ने भी हामी भर दी। हम अगले ही स्टेशन पर ट्रेन से उतर गए और एक घंटे बाद आने वाली गाड़ी से वापस लौट आए।
वापस लौटते वक्त ऐसा लग रहा था जैसे मृत्यु के डर ने जीने की आशा ही ख़त्म कर दी हो।
हम लौट आए और दस-बारह दिन का खाने-पीने का सामान ले आए, इस उम्मीद में कि इतने दिनों में तो लॉकडाउन ख़त्म हो ही जाएगा। लेकिन लॉकडाउन ख़त्म होने के लिए बारह दिन भी काफ़ी नहीं थे। आज 4 अप्रैल है। खाने-पीने का सारा सामान ख़त्म हो चुका है। बस चावल बचा था, जो बब्बन पिछली बार गाँव से ले आया था।
दूध वाले भैया सुबह आते थे। उनसे हम आधा लीटर दूध दूर से ही ले लेते थे। साथ ही दस्ताने और मास्क बेहद ज़रूरी थे, हमारे लिए भी और दूध वाले भैया के लिए भी। कोरोनावायरस की चपेट से तो अभी तक हम अछूते थे, लेकिन भूख ने हम पर असर दिखाना शुरू कर दिया था।
आधे लीटर दूध में दुपहर में चावल उबालकर हम दोनों खा लेते थे। उसके बाद अगले दिन की दुपहर को ही खाना नसीब होता था। यह दुपहर का खाना भी ज़्यादा दिन का मेहमान नहीं था।
घर से रोज़ फ़ोन आता था। बात हो जाती थी। माँ रोने लगती थी। मैं भी चाहता था रो लूँ, लेकिन नहीं रो पाता था। मुझे लगता था, मुझे रोता देख बब्बन भी रोने लगेगा। उसे सँभालने का काम मेरा था, ऐसा मैं सोचता था।
बीच-बीच में सब्र का बाँध टूटता तो पापा को कोसने लगता कि क्यों इतने कठोर थे पापा। कभी उनको रोते हुए नहीं देखा। उनके जैसा ही बनने के चक्कर में ज़िम्मेदारियों को उठाने वाला बनता गया, रोना एकदम से भूल गया।
सुबह-सुबह जब मैं दूध लेने गया तो एक अंकल भी वहीं दूध ले रहे थे। उन्होंने पूछा कि कितने लोग हैं इस बिल्डिंग में अभी। मैंने कहा, “बाक़ी लोग तो चले गए हैं। हम लोग ही बचे हैं—मैं और मेरा दोस्त।”
उन्होंने पूछा, “क्या करते हो?”
तो मैंने बताया कि बीएससी कर रहे हैं, यहीं पहाड़गंज के पास वाले ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से।
उन्होंने कहा, “यहाँ तो बहुत मुश्किल हो जाएगी बेटा। सब लोग अपने-अपने घर जा रहे हैं, तुम भी किसी तरह से चले जाओ।”
फिर एकटक अंकल मेरी ओर देखने लगे। मैंने सुना था कि पास वाली बिल्डिंग में एक लड़के की कोरोनावायरस से मौत हो गई है। वह लड़का इन्हीं अंकल का था। जब उन्होंने अचानक मुझे ‘बेटा’ कहा तो शायद उन्हें मुझमें उनका बेटा नज़र आने लगा होगा।
थोड़ी देर बाद ख़ुद को सँभालते हुए बोले, “मैं देखता हूँ, शायद तुम लोगों के घर जाने का इंतज़ाम हो जाए।”
उन्होंने मेरा फ़ोन नंबर ले लिया और फिर मैं वापस लौट आया।
उसी दिन शाम को उन्होंने फ़ोन किया और कहा, “अपना आईडी और डिटेल्स भेजो। मैं तुम लोगों के जाने का पास बनवा दूँगा।”
मैंने पूछा, “लेकिन अंकल, हम जाएँगे कैसे? गाड़ी वग़ैरा तो जाने नहीं दे रहे हैं।”
उन्होंने कहा, “पास बन जाएगा तो तुम लोगों को जाने देंगे।”
अगली सुबह अंकल मिले और मुझे पास देते हुए कहा, “तुम्हारे गाँव की ओर जाने वाली कोई गाड़ी नहीं मिली बेटा। तुम अभी यह पास अपने पास रखो, मैं और कोई रास्ता देखता हूँ।”
मैं उदास चेहरा लिए हुए अपने रूम की ओर मुड़ा ही था कि अंकल ने आवाज़ लगाई, “सुनो बेटा, तुम लोगों को बाइक चलानी आती है?”
मैंने कहा, “हाँ, मुझे आती है।”
उन्होंने कहा, “तुममें मेरा बेटा नज़र आता है।”
ऐसा कहते हुए उनकी आँखों में आँसू नज़र आने लगे थे। लेकिन मर्दों के स्वभाव के अनुसार उन आँसुओं ने बाहर तक आ पाने की हिम्मत नहीं जुटाई।
“तुम दो लोग हो, एक बाइक पर जा सकते हो? मेरा बेटा तो अब नहीं रहा। मैं नहीं चाहता कि किसी और का बेटा किसी से छीन जाए। तुम लोग बाइक लेकर चले जाओ और जब यह सब शांत हो जाएगा, तब ट्रेन से बाइक लेकर लौट आना। बाक़ी फ़िक़्र मत करना। मेरा नंबर तुम्हारे पास है। जब भी कोई पुलिसवाला रोके, पास दिखा देना। नहीं माने तो मुझसे बात करा देना।”
फिर अंकल चले गए और मैं भी अपने रूम चला आया।
सब बातें मैंने बब्बन को बताईं तो उसने कहा, “तुम चला लेते हो अच्छे से बाइक, चलो ना चलते हैं।”
मैंने हाँ कर दी और फ़ोन करके अंकल से कहा कि हम चले जाएँगे। उन्होंने कहा, “रात में निकलना ठीक नहीं होगा। भोर में निकल जाना। भोर होते ही फोन करना, मैं बाइक दे दूँगा।”
मैंने फोन किया तो अंकल बाइक के साथ कुछ खाने के लिए भी लेकर आए थे। हम लोग भी ज़रूरत के सामान का एक बैग भरकर निकल लिए। हमें जाते हुए अंकल पीछे से काफ़ी देर तक देखते रहे, जैसे अपने लड़के को विदा कर रहे हों—बब्बन ने मुझे बताया था।
क़रीब पाँच घंटे लगातार बाइक चलाने के बाद मैं थक गया था। हम लोग एक जगह पर रुके और नल से हाथ-मुँह धोने लगे। तभी उधर से एक लड़की, क़रीब पाँच-छह साल की, हाथों में छोटी-सी बाल्टी लिए नल की ओर आ रही थी।
फटा हुआ-सा फ़्रॉक, मैल की परत से ढका हुआ चेहरा और धूल में लिपटे हुए बालों से वह लड़की सजी हुई थी। बाल थोड़े लंबे थे। ऐसा लग रहा था, झलरी के बाल अभी तक उसका पीछा किए हुए हैं। इन सबसे अलग उसकी ख़ूबसूरत नीली-नीली आँखें, अभावों के बावजूद उसकी शोभा को बढ़ा रही थीं।
उसकी सारी काया का आकर्षण और केंद्र थीं उसकी आँखें। उन नीली आँखों को न देखने की नाकाम कोशिश के बाद मैं पूछ बैठा, “क्या नाम है तुम्हारा?”
वह कुछ देर हम दोनों को एकटक देखती रही। मैंने फिर से पूछा तो उसने कहा, “लिली।”
उसकी आवाज़ में स्पष्टता थी, लेकिन साथ में एक अस्पष्टता भी कि उसने अपना नाम ख़ुद लेना सीखा है, किसी प्रकार की कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई है उसे।
मैं उसकी ओर बढ़ा तो बब्बन ने कहा, “अनजान को मत छुओ, वायरस।”
मैंने शायद नहीं सुना था। मैं लिली के हाथ से बाल्टी लेकर पानी भरने लगा। फिर मैंने पूछा, “तुम अकेली यहाँ क्या कर रही हो? और कौन है तुम्हारे साथ?”
“और कौन है तुम्हारे साथ?” के जवाब में उसने पीछे मुड़कर उँगली से इशारा किया। इशारा पीली बरसाती की एक झोपड़ी की ओर था। मैंने बब्बन की ओर देखा, फिर हम लोग झोपड़ी की ओर चल पड़े। लिली आगे-आगे चल रही थी।
हम वहाँ पहुँचे तो देखा कि बैंगनी रंग की एक मैली साड़ी में एक औरत तीन ओर से घिरी हुई ईंट से बनाए गए चूल्हे के सामने बैठी है। साड़ी को देखकर लग रहा था कि उसका रंग कुछ और होता तो उसकी मलिनता और भी बढ़ जाती। पूरे शरीर पर श्रम की एक ऐसी मलिनता छाई थी, जो शायद साबुन से भी नहीं छूटेगी।
अपने दोनों हाथों से महिला आटे को इधर-उधर कर रोटी का आकार दे रही थी। चूल्हे पर तवे जैसा दिखने वाला टीन का एक पात्र चढ़ा था, जिस पर एक मोटी रोटी सेंकी जा रही थी। दूसरी रोटी महिला के हाथों में उस तवे पर जाने के लिए तैयार हो रही थी और नीचे रखा आटे का बर्तन ख़ाली हो चुका था।
मैं लिली को गोद में लेकर वहीं बैठ गया और लिली की माँ से पूछने लगा कि लिली के पापा कहाँ हैं?
उन्होंने बताया कि कुछ महीने पहले कुछ लोग आए थे। उनको काम के लिए पूछा और ले गए। तब से न उनकी ख़बर आई है और न वह आए हैं। ऐसा कहते वक़्त लिली की माँ की आवाज़ भर आई थी।
मैंने दूसरा सवाल पूछा, “कोरोनावायरस बढ़ रहा है, आपको डर नहीं लगता?”
उन्होंने कहा, “हमारा तो रोज़ ही मृत्यु से सामना होता है, तो किस बात का डर। कई बार तो दो दिन तक चूल्हा ही नहीं जलता। मैं तो कब की इस दुनिया से मुक्ति पा चुकी होती, लेकिन इस नन्ही-सी जान के लिए संघर्ष करती रहती हूँ।”
कुछ और भी बातें दीदी (लिली की माँ) के साथ हुईं, किंतु उनका सिलसिलेवार वर्णन कहानी को लंबा खींचने के सिवा और कुछ नहीं होगा।
दीदी उठीं और झोपड़ी में जाकर रोटी और खाने का सामान रख आईं। मैंने पूछा, “दीदी, आपने तो सिर्फ़ रोटी ही बनाई है, सब्ज़ी वग़ैरा?”
उन्होंने कहा, “सब्ज़ी है कहाँ? नमक और प्याज़ है, उसके साथ खा लेंगे।”
हमारी थकान कुछ कम हुई तो हम चलने को हुए। लिली हमारे साथ हमारी बाइक तक चली आई थी और हमें जाते हुए काफ़ी देर तक देख रही थी। हमारे पास कुछ खाने-पीने (स्नैक्स, जो अंकल ने दिया था) का सामान था, जो हमने लिली को दे दिया।
जाते वक़्त लिली की नीली आँखें मेरे आँखों के सामने चल रही थीं।
एक लंबी यात्रा के बाद हम अपने गाँव पहुँचे। मैंने बब्बन को उसके घर छोड़ा और फिर अपने घर चला आया। कोरोनावायरस का डर कहें या घरवालों की सुरक्षा, मैंने पहले ही अपने लिए एक अलग कमरा ख़ाली कर देने के लिए कह दिया था और उसी में 14 दिन तक क्वॉरेंटाइन में रहा।
जिस दिन घर पहुँचा, उसी दिन आरटीपीसीआर चेकअप के लिए जिला चिकित्सालय चला गया था, जिसकी रिपोर्ट अगले दिन आने वाली थी।
अगले दिन रिपोर्ट आती है और पाया जाता है कि मैं भी कोरोनावायरस की चपेट में आ चुका हूँ। यह सुनकर मुझे अपना ख़याल बाद में आया। सबसे पहला ख़याल जो आया, वह नीली आँखों वाली का था। हाँ! वही नीली आँखों वाली—लिली।
मैं सिर पर हाथ रख वहीं बैठ गया और अपने आप को कोसने लगा कि मुझे उस लड़की को नहीं छूना चाहिए था। मैंने बब्बन को फ़ोन किया और पूछा कि उसने चेकअप कराया?
उसने कहा, “हाँ! मेरा भी पॉजिटिव है।”
मैंने उससे कहा, “यार, लिली…”
बब्बन समझ गया। उसने कहा, “चिंता मत कर, उसे कुछ नहीं होगा। हम लोगों ने मास्क तो कहीं नहीं उतारा था, तो कैसे फैलेगा।”
इस बात पर मैंने कहा, “हम दोनों भी तो बराबर मास्क में थे, फिर भी हम दोनों को हो गया ना।”
बब्बन ने मुझे बहुत समझाने की कोशिश की कि कुछ नहीं होगा, चिंता मत करो। लेकिन लगातार मैं उसी के बारे में सोच रहा था।
शुरू के कुछ दिन तक मुझे बहुत तेज़ बुख़ार रहा, लेकिन दिन बढ़ने के साथ-साथ कम होता रहा। दिन जैसे-जैसे बीतते गए, नीली आँखों वाली मेरी यादों के और क़रीब आती गई।
मैं हर रोज यही सोचा करता था कि काश! वहाँ रुका ही न होता, मैंने उसे छुआ ही न होता। शारीरिक रूप से तो मैं स्वस्थ हो गया था, लेकिन मानसिक रूप से मैं अभी बीमार ही था।
और यह भी सोचता था कि लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद हम वापस दिल्ली जाएँगे। लिली को देखते हुए जाएँगे। ऐसे ही कुछ महीने बीत गए, लेकिन वापस लौटने का वक़्त नहीं आया। कोरोना महामारी और भी बढ़ गई।
एक दिन मैं नींद में था। नीली आँखों वाला एक चेहरा मेरे सामने आता और फिर ग़ायब हो जाता। फिर रोटी बना रही एक महिला का चित्र आता और ग़ायब हो जाता। धीरे-धीरे चित्र कुछ स्पष्ट होने लगते हैं।
लिली मेरे पीछे-पीछे आ रही है। मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया है और उसकी नीली आँखों को चूम रहा हूँ। मैं क्या देखता हूँ कि लिली का चेहरा पूरी तरह से तप रहा है। वह धीरे-धीरे अपना होश खो रही है, पानी माँग रही है।
मैंने उसे पानी पिलाया और अस्पताल की ओर भाग रहा हूँ। पीछे-पीछे दीदी भी हैं। जैसे ही अपनी गाड़ी के क़रीब पहुँचता हूँ, उसका एक हाथ बेसहारा हवा में झूलने लगता है, शरीर ठंडा होने लगता है, उसकी आँखें खुली हुई हैं।
उन नीली आँखों में मैं देख रहा हूँ। उसकी माँ की आँखों में आँसुओं की धारा बह रही है। मेरी आँखों में भी पानी उतर आया है।
सहसा मेरी नींद खुल जाती है और झट से मैं उठ जाता हूँ। अपने हाथ आँखों के पास ले जाता हूँ। आँखें पूरी तरह से भीगी हुई हैं, शरीर पसीने से लथपथ है। ख़ुद को सँभाल मैं बाथरूम में जाकर हाथ-मुँह धोने लगता हूँ।
सुबह के चार बजे हैं। फ़ोन की घंटी बजती है। उधर से भैया कह रहे हैं, “तुम्हारी भाभी को लड़की हुई है। सुबह माँ और बाबूजी को हॉस्पिटल लेकर आ जाना।”
मैं, माँ और बाबूजी को लेकर हॉस्पिटल पहुँचता हूँ। सब लोग ख़ुश हैं। भाभी और भैया को बधाई दे रहे हैं।
मेरे अंदर रात का सपना बराबर चल रहा है। मैं बच्ची के क़रीब गया। उसे देखते ही मेरी आँखें सजल हो गईं।
मैं देख रहा हूँ बच्ची की नीली आँखों को, उसकी आँखों में लिली को, लिली की माँ को और सहसा मेरे मुँह से आवाज़ निकलती है—“लिली… नीली आँखों वाली।”
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