कहानी : फ़्रीडम
आंशी अग्निहोत्री
05 मार्च 2026
यह बस लगभग 45 किलोमीटर के सीमित दायरे में चक्कर काटती है। दायरे के भीतर तमाम स्टॉप पड़ते हैं। अलग-अलग स्टॉपों पर अलग-अलग लोग चढ़ते-उतरते रहते हैं। बस उन सभी रास्तों को पहचानती है, लेकिन उन पर मिलने वाले लोगों को नहीं।
सूरज की चौंधियाई आँखें धीरे-धीरे खुलने लगीं। बस स्टॉप पर भीड़ बढ़ती जा रही थी। चूँकि आज भाई दूज है, इसलिए लोग अपने भाई-बंधुओं के पास आ-जा रहे हैं। सुबह के 8:45 हो चुके हैं। मुझे भी बस पकड़नी थी, सो मैं भी बस स्टॉप पर आकर बस का इंतज़ार कर रही थी। मुझे बस में मितली आती है लेकिन कोई और चारा है भी नहीं। शहर जाने के लिए बस ही एक विश्वसनीय साधन है। बाक़ी टैंपो का कोई ठिकाना नहीं और मैं डरती भी हूँ उनमें बैठने से। औरत के भीतर तरह-तरह के डर होते हैं। बेतुकी-सी लेकिन डरावनी लगने वाली वजहें।
गाँव का बस स्टॉप कोई ज़्यादा बड़ा बस स्टॉप नहीं था। स्टॉप के नाम पर पान मसाले की एक गुमटी थी। जिसको टीन और लकड़ी के खोल के चौकोर ढाँचे से बनाया गया था। उस गुमटी में 15-16 बरस की एक लड़की बैठती थी। दो फीते से गुथी हुई चोटी बाँधे वह पुराने मैले से सलवार-क़मीज़ में ही दिखाई देती। उसके सुनहरे बाल हमेशा तेल में चिकटे रहते। चेहरा चकत्तों से भरा रहता। जब वह ज़रा-सी एड़ी उचकाकर गुमटी में बैठे-बैठे बाहर टंगे मसाले की पुड़िया तोड़ने की कोशिश करती। सामने खड़े कुछ मर्द उसकी लचक को चोर नज़रों से देखने लगते। बग़ल में एक सिलाई की दुकान थी। मैं वहाँ जब भी जाती दुकान का मालिक कुछ न कुछ सिल रहा होता था। पैंट-शर्ट, कुर्ता-पैजामा, कोट आदि। दुकान वाले के सिर पर हमेशा वह सफ़ेद टोपी रहती। दाढ़ी के बाल हमेशा नारंगी और काले से रहते। उनकी आँखें मशीन पर रहतीं, पर फिर भी आस-पास बैठे लोगों से बातचीत जारी रखता था वह। वह अपना काम तल्लीनता से करते थे। मेरे पिता जी को जानते थे शायद। मैं जब भी जाती, वह मुझे एक कुर्सी दे दिया करते। आज दुकान में एक और बुज़ुर्ग आदमी था। जिस प्रकार वे आपस में हँसी-ठिठोली कर रहे थे, इससे जान पड़ता था, वह यहीं-कहीं आस-पास का होगा।
9:10 पर बस घरघयाते हुए आकर गुमटी के सामने रुक गई। मैं और मेरे पास बैठी औरत जिसे उस बस से ही जाना था, उठ खड़ी हुई। हम बस के दरवाज़े के सामने आकर खड़े हो गए। जिनका यही स्टॉप था, वे यात्री बस से उतर रहे थे। चूँकि मुझे खिड़की के बग़ल वाली सीट की दरकार थी, इसलिए सारे यात्रियों के उतरते ही मैं पहले-पहल बस में चढ़ गई। चढ़ते ही मैंने चारों तरफ़ नज़रें दौड़ाईं। बस में दाहिने ओर एक ही खिड़की वाली सीट ख़ाली थी। उस सीट की बग़ल में एक सज्जन ध्यानमग्न हो बैठे थे।
मैंने उन सज्जन से पूछा—“चाचा यह सीट ख़ाली है क्या?”
सज्जन बोले—“नहीं हमारे साथ वाले बैठेंगे।”
मैं अफ़सोस भरी नज़रों से चारों ओर देख ही रही थी कि तभी दूसरी तरफ़ से एक अधेड़ उम्र का आदमी बोला—“का बंधू। बिटिया का बइठ जाए दा। का बिटिया कौनो दिक्कत है!”
मैंने जवाब दिया—“हाँ चाचा। थोड़ा जी ठीक नहीं है। मितली-सी लगती है।”
सुबह ही मुझे एक बार उल्टी हो चुकी थी।
“अरे भाई! एकैती आ जा तुम। हमरे लगे सीट कुल खाली है।”
वह अपने बग़ल की सीट में खिसकते हुए सज्जन से बोला। उसके बग़ल की दो सीटें ख़ाली थीं। उस तरफ़ धूप की सीधी किरनें पड़ रही थीं। उन सज्जन ने सीट ख़ाली की और मन मार कर वह दूसरी सीट में बैठ गए। मैं और मेरे साथ चढ़ी औरत मेरे बग़ल वाली सीट पर बैठ गई।
मैं मनचाही सीट पर बैठकर मन ही मन प्रसन्न हो ही रही थी कि वह औरत मेरी तरफ़ मुख़ातिब हुई और बोली—“कहाँ जाए का है बिटिया तुमका?”
इतने निजी सवाल मुझे अच्छे तो नहीं लगते लेकिन मैं फिर भी आहिस्ते से जवाब दे देती हूँ—“हमें फ़तेहपुर तक जाना है।”
मैं यह कहकर चुप हो गई। लेकिन मेरे कुछ न पूछने पर भी वह औरत मुझे बताने लगी कि उसे भी फ़तेहपुर, राधा नगर जाना है। वहाँ उसके चचेरे भाई रहते हैं, जिनको वह टीका लगाने जा रही है। उसके ख़ुद के भी भाई हैं, लेकिन वह वहाँ नहीं जाएगी क्योंकि उसके कोई सगे भाई उसके बेटे की बरात में नहीं आए। वह बोलती जा रही थी और मैं सुनती जा रही थी। उसने भाई की बेटी की शादी में पाँच हज़ार तक का ख़र्चा कर के उपहार दिए थे। बिछिया भी देकर आई थी। लेकिन अपनी बारी पर वह आए ही नहीं। इसलिए वह अब नहीं जाएगी उनके यहाँ। हालाँकि मैं चुप ही रहना चाहती थी, लेकिन फिर भी मैं सहमति में सिर हिलाती रही। मेरे पास कोई और चारा भी नहीं था। वह औरत बोलना जारी ही रखती लेकिन तभी कंडक्टर आकर टिकट काटने लगा। मुझे बस स्टॉप पर ही उतरना था तो मुझसे उसने 35 रुपए लिए। उस औरत को राधा नगर उतरना था तो उससे 41 रुपए लिए। वह समझ नहीं पाई। उसने कंडक्टर को 50 का नोट थमाया था।
वह कंडक्टर से शिकायती अंदाज़ में बोली—“का भैय्या केतने लिन्हौ।”
कंडक्टर दूसरी टिकट काटने में व्यस्त था। बोला—“जहाँ का बोली हो उतना अउर केतना।”
वह अपना टिकट घूरे जा रही थी। मेरी तरफ़ टिकट बढ़ाते हुए बोली—“देख बिटिया तनू केतना लीन्हिस है या।”
मैंने उसे समझाने की कोशिश की, पर वह सब व्यर्थ था। उसे और मुझे फतेहपुर के दो अलग-अलग कोनों में उतरना है, यह उसे समझाया नहीं जा सकता था। आख़िरी तक उसे पाँच रुपए ज़्यादा देने का मलाल खाता रहा।
हमारे दाहिने तरफ़ की पिछली सीट पर एक लड़की बैठी थी। पीला कटिंगदार कुर्ता जिसकी पीठ पर दिल बना था और नारंगी लेगिंग। चमकीले से चप्पल और जूड़े में बंछे बाल। हाथों-पैरों में लाल नेल पॉलिश। वह काफ़ी देर से हाथ नचा-नचा कर अपनी तत्काल ही लगी नौकरी के बारे में बातें कर रही थी। उसके बातों में मैरिज, काम्प्रोमाइज, सैलरी, फ़्रीडम और हसबैंड जैसे शब्द आ जाते थे। वह अपने बग़ल वाले यात्रियों को बता रही थी, कैसे उसके पति ने उसे जान से मारने की कोशिश की और वह मायके आकर रहने लगी। मायके के तानों से परेशान होकर वह नौकरी पाने की कोशिश करती रही और अब उसे नौकरी मिल गई है। वह महिलाओं के लिए सरकारी समूह चलाती है, जिसमें उन्हें आर्थिक मदद दी जाती है। उसका अपना वेतन 18,000 रुपए महीना है। जिससे उसका ख़र्च आराम से चल जाता है। अब तानों की जगह उसे इज़्ज़त दी जाती है।
“सब पैसा का रैसा है भैय्या।”—यह वाक्य वह बार-बार दोहराती।
बातों ही बातों में फ़ोन घुमाकर किसी न किसी से बात करने लगती। फिर दोबारा अपनी कहानी पर आ जाती। उसके आगे दो बुज़ुर्ग बैठे थे। उन्हें शायद उसकी बातें कुछ ख़ास पसंद नहीं आ रही थीं। उसकी बातों में ऐसा क्या नापसंद करने लायक़ था, यह मैं भी नहीं जानती लेकिन कुछ तो परेशानी थी उन्हें। उनमें से एक बुज़ुर्ग आदमी जो धोती-कुर्ता पहने था बोला—“तनु गम खाय जा। बहुत बताति हा तैं।”
वह क्यों चुप रहती। बोली—“तुमको क्या प्रॉब्लम है। हम अपना आपस में बात कर रहे हैं। सब कोई बोल रहा है, बस है घर नहीं है किसी का।” उसका चेहरा तमतमा आया था।
वह आदमी फिर बोला—“केहका सुनावतिहा तैं। अपनै तक बोलि।”
वह पलटकर बोली—“ना सुनो तुम। कौन होते हो हमको टोंकने वाले।” वह सीट से खड़ी हो गई थी। लड़ाई के पूरे आसार थे। बाक़ी कुछ यात्री बीच-बचाव करने लगे, कुछ मुँह दबा के हँस रहे थे।
वह बूढ़ा गरजा—“अबहिन मरिहौं ता लोट जइहे।”
अब उसका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था—“हिम्मत है तो मार के देखाओ। हम भी देखें कितनी हिम्मत है।”
अब लोग उन्हें चुप करा रहे थे। मेरे बग़ल की औरत बोली—“राम राम। कौन तरन जबान चड़ावति आए।”
अब मुझसे रहा नहीं गया—“क्या ग़लती है उसकी। बातें ही तो कर रही थी। और कौन होता है किसी को मारने वाला।”
यह सुनते ही वह चुप हो गई। उसकी तिरछी निगाहें अब पीले कुर्ते वाली औरत के साथ ही साथ मुझे भी तोल रही थीं। हालाँकि मैं इस झमेले में नहीं फँसना चाहती थी तो मैं चुप हो गई। वह औरत भी चुप हो गई। उसके बाद हम दोनों में कोई और बात नहीं हुई।
बस रुकती-रकाती लोगों को अपने ठिकानों तक पहुँचाती जा रही थी। मेरा स्टॉप आने वाला था, मैं अपना सामान उतारने लगी। इस तरह की लड़ाइयाँ आम हो चली हैं, जो हर दूसरी औरत को लड़नी पड़ती हैं और लड़नी चाहिए भी। मेरा स्टॉप आ गया। मैं बस से उतर गई। मेरी बग़ल में बैठी औरत खिड़की से मेरी तरफ़ देख रही थी। धूप तेज़ थी। स्टेशन कुछ ही फलाँग पर था, इसलिए मैंने पैदल चलना ही सही समझा। मैंने अपना झोला कांधे पर लादा और चल दी।
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