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जो घुला नहीं

बचपन में जब मेरी माँ दुपहर के वक़्त आराम करते हुए सो जाया करती थी, तब मेरी बड़ी बहन और मैं किचन में जाकर खाना बनाने का खेल खेला करते थे। मैं इतनी छोटी थी कि मुझे चूल्हा जलाना तक नहीं आता था और घर में आग लग जाने के डर से हम दोनों बहनें कोशिश भी नहीं करती थीं।

तो बिना चूल्हा जलाए खाना कैसे पके?

इसका एक साधारण-सा समाधान हमने निकाल लिया था। ऐसा समाधान जिससे अपनी करतूत को छुपाना भी आसान था। हम दोनों एक-एक काँच के गिलास में आधा पानी भरते और उसमें अपनी मर्ज़ी से मसाले डालते जाते। साबुत मसाले, पिसे हुए मसाले, अचार का मसाला—जो मिल जाए।

मेरी उम्र तब छह-सात साल की रही होगी। मुझे पता नहीं था कि साबुत मसाले पानी में नहीं घुलते। मैं उन्हें गिलास में डालकर ऊपर से पाउडर वाले मसाले डालती और चम्मच से देर तक चलाती रहती। उम्मीद यही होती कि कभी तो घुलेंगे। लेकिन लौंग, काली मिर्च, इलायची, तेज़ पत्ता—उन्हें क्या पड़ी थी घुलने की। उनका वह मिज़ाज ही नहीं था।

शुरू में मैं पाउडर वाले मसाले कम डालती थी। पर जब देखा कि साबुत मसाले नहीं घुल रहे, तो उन की मात्रा बढ़ा दी। दो-दो, तीन-तीन चम्मच नमक, लाल मिर्च, धनिया पाउडर। मसाले इतने हो जाते कि गिलास में पानी ऊपर तक आ जाता। पानी को चलाने के कुछ देर बाद नीचे मसालों की एक परत जम जाती और ऊपर कीचड़-सा रंग लिए पानी अलग दिखता।

माँ के उठने से पहले मैं गिलास में उँगली डालकर साबुत मसाले निकाल लेती, पानी सिंक में बहा देती और नीचे बैठी परत को चम्मच से खुरचकर फेंक देती। कुछ दिनों में मम्मी-पापा को गिलास में तीखापन महसूस होने लगा। एक शाम माँ ने पूछा, “इस गिलास में किसी ने मिर्च डाली थी क्या?” तब समझ आया कि सिर्फ़ खंगाल देने से काम नहीं चलता। साबुन से माँजना पड़ता है क्योंकि मसाले अपना निशान छोड़ जाते हैं।

कुछ दिन और चला यह खेल। फिर जैसे बच्चों का मन भर जाता है, वैसे ही हमारा भी मन भर गया।

अब मैं बड़ी हो चुकी हूँ। जीवन के दूसरे अनुभवों से गुज़रते हुए कभी-कभी लगता है कि उस उम्र में मैं रसायन शास्त्र नहीं, दिल का व्याकरण सीख रही थी। शायद दिल भी एक काँच का गिलास ही होता है। पारदर्शी दिखता हुआ, भीतर डाले गए हर तत्व का हिसाब रखता हुआ।

अब उन गिलासों को याद करती हूँ तो समझ आता है कि इलायची का अपना एक हठ होता है। कुछ लोग भी उसी हठ से बने होते हैं। उन्हें अपने भीतर उतारने की कोशिश में आप कितनी भी चम्मच चला लें, वे घुलते नहीं। आख़िर हर तत्व का अपना मिज़ाज होता है। कोई इलायची की तरह ऊपर तैरता रहता है। तो कोई तेज़ पत्ते की तरह नीचे बैठ जाता है और हम चम्मच लिए दिल-रूपी गिलास के पानी को चलाते रहते हैं, मानो मेहनत से स्वभाव बदला जा सकता हो। पर इसमें ग़लती न इलायची की होती है, न तेज़ पत्ते की। वे बने ही नहीं होते घुलने के लिए। पिसे हुए मसाले भी एक मात्रा के बाद अलग परत बना लेते हैं, जैसे कह रहे हों—बस।

और हम?

पहले तो बहुत कोशिश करते हैं कि चम्मच चलाने से कोई समाधान निकल आए। घुमते हुए पानी में बिल्कुल घुल-मिल गए, पिसे हुए मसाले कुछ पल के लिए सुकून का पात्र भी बन जाते हैं। लगता है, मिश्रण तैयार हो जाएगा। उसी घूमते हुए पानी में साबुत मसाले भी चक्कर काटते रहते हैं। दिमाग़ और दिल जानते हैं कि ये कुछ देर में अलग हो जाएँगे—लेकिन जब तक घूम रहे हैं, तब तक उम्मीद भी घूमती रहती है।

फिर चम्मच घुमाते-घुमाते हाथ दुखने लगता है। हम चम्मच को गिलास के किनारे पर झटक कर रख देते हैं और फिर शुरू होता है इंतज़ार। थोड़ा-सा वक़्त बीतता है। सबसे पहले पिसे हुए मसाले अपनी परत बनाकर नीचे बैठ जाते हैं। हमें कुछ आश्चर्य ज़रूर होता है। पिसे मसालों से तो उम्मीद होती है कि वे घुलेंगे। पर वे भी एक हद के बाद अलग हो ही जाते हैं। फिर आता है पानी। रंग बदल चुका, स्वाद बदल चुका। पर घुलना पूरा नहीं होता। वह न पूरा पानी रहता है, न मसाला। मसालों की परत के ऊपर थका हुआ-सा बैठ जाता है। और अंत में आते हैं साबुत मसाले। ऊपर तैरते हुए। ख़ुद को लगभग वैसा ही रखे हुए। बस, इस गंदे पानी और मसालों की कड़वाहट से कुछ गीले, कुछ नरम। इतना-सा बदलाव—बदलाव कहलाता है क्या?

लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। क्योंकि उसके बाद आता है हमारा पुराना अभ्यास—उँगली की मदद से साबुत मसाले चुन लेने का। दिल के साथ भी हम यही करते हैं। जो बहुत चुभता है, और स्पष्ट रूप से अघुलनशील दिख रहा होता है, उसे सब से पहले निकाल कर फेंक देते हैं। नाम दे कर, दोष दे कर।

फिर आती है पानी की बारी। वो पानी, जो अब पानी रहा ही नहीं। न पूरा मसाला है, न पूरा तरल। बस एक बदला हुआ रंग, एक अजीब-सी गंध, एक अनिश्चित स्वाद। हम उसे सिंक में उँडेल देते हैं, मानो उसे बहा देने से वो समय भी बह जाएगा, जिसमें हम उसे चलाते रहे थे।

और अंत में बची हुई तलछट को खुरचने की बारी आती है। गिलास से नहीं—यादों से। हम नीचे बैठी परत को खुरच कर अलग करना चाहते हैं। मानो जो बैठ गया है, उसे निकाल देने से गिलास फिर से पारदर्शी हो जाएगा। लेकिन बहुत मांझने के बाद भी कुछ कड़वाहट रह जाती है। कभी-कभी तो गिलास के काँच में पीलापन भी आ जाता है। हम चाहे जितना माँझ लें, काँच याद रखता है।

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