दास्तान-ए-गुरुज्जीस-5 : क़यामत के दिन भी हमने वाइवा दिया!
ज्योति तिवारी
21 अगस्त 2025
चौथी कड़ी से आगे...
हम अब वापस सिंहद्वार के भीतर थे! इस बार महाविद्यालय की जगह विभाग हिस्से आया था। बक़ौल मित्र—अब हम सिंहद्वार के भीतर हिंदी की कुछ भोजपुरी कक्षाओं का लाइव देखने के लिए सज्ज थे। तब के क्लर्क, अब के को-सुपरवायज़र साहब ने हमारे असली प्रमाण-पत्रों को तड़ीपार कर दिया था; चार बार ‘प्लीज़-प्लीज़-प्लीज़-प्लीज़’ करने पर वह उन्हें खोजने के लिए तैयार हुए। संभवतः हमने पहली और आख़िरी बार उन्हें मुस्कुराते देखा था। हमने ‘मर्द साठा पर पाठा होता है’ पढ़ना शुरू करते हुए, बहरहाल खिड़की की तरफ़ मुँह किए गुरुजी से ग़ालिब और मीर के चार-छह शे’र सुने, कुछ करुण रस की कविताओं को वीर रस में पढ़ा, महादेवी वर्मा को आकुल-व्याकुल की ऊँचाई तक ले गए और इस ऊँचाई तक ले गए कि परम मित्र की मित्र—जो हमारी भी मित्र रहीं—ने साठ मिनट की क्लास में सोलह बार अपनी कॉपी में आकुल-व्याकुल नोट किया। कक्षाओं में हमने मन भर संस्मरण सुने, जो संस्मरण से कभी ख़ाली हुए तो किताब का एकाध पन्ना व्याख्यायित हो गया, लाउडस्पीकर-सी उठती आवाज़ों ने हमसे बार-बार पूछा—आवाज़ पीछे तक पहुँच रही है कि नहीं और हमारा मन रिरियाता रहा कि हम यहाँ अटेंडेंस के लिए बैठे हैं, आवाज़ के लिए नहीं, हमें बख़्शा जाए।
सारे गुरुजी लोग साहित्यकार थे! ज्ञानी थे! शोध निर्देशक थे! मोटी-मोटी किताबें पढ़ते थे! मोटी-मोटी किताबें लिखते थे! ऐसी ही किताबों को पढ़ने का सुझाव देते थे और हम अज्ञानी अपनी अज्ञानता पर खीझे हुए एक क़ाइदे का अध्यापक ढूँढ़ते रहे। हमारा हाल ‘सब मिला दिलनशीं, एक तू ही नहीं’ जैसा था। हालाँकि हमारे दोस्तों को सब समझ आता था, सब पढ़ते थे, बहस-विचार भी करते थे; पर हम इस क़दर मूढ़ मति थे कि हमें वहाँ भी कुछ समझ नहीं आता था। हम अभी किताबें समझने की कोशिशें कर ही रहे थे कि किसी ने एक दिन दक्षिणपंथ का सिक्का उछाल मारा और यह दक्षिणपंथ और वामपंथ हमने आज तक नहीं समझा, हम आदमी बने रहने की कोशिशों में ही लगे रहे।
समय बीतते-बीतते अब क़यामत के दिन आ गए थे। हम वाइवा दे रहे थे। सामने गुरुजी बैठे थे। गुरुजी ने ‘कामायनी’ की कुछ पंक्तियों में छंद पूछा। हमने रटा था, बताया—ताटंक! गुरुजी ने पूछा—देवी जी! कहाँ पढ़ा आपने?
हमने कहा—सर जेरॉक्स था।
गुरुजी ने कहा—कुछ तो पन्नों के आगे-पीछे, ऊपर-नीचे लिखा रहा होगा!
हमने कहा—सर पूरा नाम नहीं याद, कुछ श्रोत्रिय जैसा लिखा था।
उस दिन अनुशासनप्रिय और सख्त मिज़ाज गुरुजी ने अपना धैर्य नहीं खोया और यह एक बड़ी बात थी। गुरुजी सुदर्शन व्यक्ति थे, कभी-कभी लगता था कि इनकी कक्षा बोझिल है तो क्या इन्हें देखकर भी साठ मिनट काटा जा सकता है; पर गुरुजी लोगों पर ध्यान केंद्रित करने का नुक़सान यह है कि वह आप पर ध्यान केंद्रित करते हुए सारा ज्ञान उड़ेलने लगेंगे, फिर कक्षा में आप झपकी या उबासी जैसे पुनीत कर्म करने में स्वयं को अक्षम पाएँगे। बाद के दिनों में पता चला कि अपने युवाकाल में गुरुजी के पास कॉलेज आने के लिए एक जीप हुआ करती थी और वह अपने पैंट के पीछे पिस्तौल खोंसे रहते थे। गुरुजी का ऑरा और रौला दोनों ही विहंगम था।
हम घोर अज्ञानी थे—हमें नहीं पता था कि ‘काला जल’ के लेखक कौन हैं, हमें नहीं पता था कि ‘पहाड़ पर लालटेन’ किसकी रचना है। हम कक्षाओं के बाहर उड़ती मधुमक्खियों और चलती बसों को देखने में लगे रहे।
उबाऊ कक्षाओं में डूबकी लगाते, ‘हम अच्छे, तुम बुरे’ करते। दरबारी बनते। कृपापात्र बनते। एक ठीहा तय करते। हम आत्मसमर्पण से आत्म तर्पण की तरफ़ बढ़ते हुए, दूसरे साल में पहुँच चुके थे।
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बहिन जी के बाद हम दूसरे थे जो यूनिवर्सल ‘दीदी’ थे। जबकि हमारे सहपाठी हम उम्र ही थे। एक साल के डायवर्जन ने हमें दीदी की कुर्सी पर बैठाए रखा। गुरुजी के ब्रह्मवाक्य कि मेरे कक्षा में आने के बाद कोई कक्षा में नहीं आएगा का भावानुवाद हम ‘गुरुजी के कच्छा में आने के बाद कोई कच्छा में नहीं आएगा’ कर चुके थे। बी.एड. करते हुए—छ, क्ष, श, ष, स के लिए जीभ को इतना रगड़ना पड़ा था कि आज भी इनके उच्चारण के पहले दिमाग़ गोटियाँ सेट करता है।
गुरुजी ने कहा कि वह विद्यापति के पदों को संकेतों में समझाएँगे और हम किसी विचार-विमर्श के बिना आगे बढ़ेंगे। गुरुजी के संकेत चार-चार पन्नों के होते थे। कई-कई कक्षाएँ ख़र्च हो जाती थी, शीलवान गुरुजी के लिए विद्यापति के पद वर्जित प्रदेश में आते थे। दूसरे गुरुजी ‘आ गए प्रियंवद...’ की व्याख्या में ऐसे डूबे कि उन्हें देखते ही क्लास में भुनभुनाहट होने लगती थी कि आ गए प्रियवंद! उन्होंने हमें हिंदी, भोजपुरी में पढ़ाई। गुरुजी ने रस पढ़ाते हुए कहा कि आजकल कि लड़कियों को रोमांच नहीं होता होगा क्योंकि रोमांच रोयें के भरभराने से बना है और अब लड़कियाँ वैक्स कराके रोयेंविहीन हो जा रही हैं। गुरुजी के मुँह में पान के बीड़े ऐसे दुबके रहे कि उनका मुँह खुले ही नहीं, बोलते समय कई दफ़ा उन्हें अपना मुख आसमान की तरफ़ करना पड़ता था। उन्हें देखकर हमें ऐसा लगता कि ज़रूर इनके लिए कोई ‘पान खाये सैयाँ हमारो’ गुनगुनाता रहा होगा। गुरुजी ने ग़ज़ल पढ़ाते कई ग़ज़लें ख़ुद की भी सुना डाली, जिससे पता चला कि वह ग़ज़लकार भी हैं। कुछ गुरुजी कभी आए ही नहीं, उनके इंतज़ार में हमारी आँखें पथराई ही रहीं।
कैंटीन से मंदिर और कैंपस की तमाम जगहों पर चकल्लस करते, मौखिकी और परीक्षाओं के दिन आने लगे। फिर वही हम, फिर वही गुरुजी लोग! गुरुजी ने व्याख्या पूछी, हमने ग़लत बताई। उन्होंने कहा हम फ़िल्टर बैठे हैं यहाँ। हमारे मन ने कहा इसलिए हम पूरी कक्षा फ़्रायड पढ़ते रहे, कविता ना पढ़ सके। हमने यूपीएससी की तैयारी करके आए गुरुजी से हिंदी की जगह इतिहास पढ़ा। मैम ने कहा कि कितना कम लिखा है जी। इस पर तुमको जीरो नंबर मिलेगा। हमने कहा कि मैम इतना लिखा है कि एक नंबर मिल जाएगा। मैम फुनफुनायी, हमारी हिमाक़त रास नहीं आई और जब ऐसी ही अहमक़ाना हरकतों की वजह से हमारे प्रिय अध्यापक ने हमसे कहा कि ‘I am disappointed to you!’ तो थोड़ी देर के लिए थोड़ा-सा ख़राब लगा, फिर हमने सोचा कि ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है!’ इस तरह मौखिकी की समाप्ति हुई।
फ़ेयरवेल पार्टी में हमारे अनुजों को हमें फ़ेयरवेल देने की इतनी जल्दी थी कि हमारे मंच पर पहुँचने से पहले वे किसी और को बुला चुके थे। वे भी हमारी मूर्खताओं से संभवतः भली-भाँति परिचित रहे होंगे, भला हो हमारे कनपुरिया मित्र का जिसने हमारी फैलती बेइज़्ज़ती को समेट लिया।
परीक्षाएँ ख़त्म हुईं। सबके मचान रजिस्टर्ड हो चुके थे। नेट की वजह से जिनके मचान की रजिस्ट्री नहीं हो पाई थी, उनको नेट निकलवाने के लिए मित्रों के झुंड के झुंड परीक्षा में बैठ रहे थे! दोस्तों ने निमंत्रण दिया कि यही रहकर हमारी छाती पर मूँग दलो! तट पर आ गई हो, नदी भी पार कर लो! हमने कहा कि तुम उस पार जाओ, जाकर दो मंज़िला बनवाओ, हम दूसरे तल्ले पर क़ब्ज़ा करने आएँगे।
बाद के दिनों, लगभग रिटायर्ड होने वाले गुरुजी—जिनकी इच्छा थी कि हम भी पीएचडी कर लें। उनका मानना था कि पीएचडी तो हो ही जाती है, ऐसे-वैसे-जैसे-तैसे-कैसे भी—का दो चमकीले दिलों वाला मैसेज फ़ोन में फ़्लैश कर रहा था। बड़े भाई ने उसकी व्याख्या की : छोटा दिल तुम्हारा है, बड़ा दिल गुरुजी का है। हम अपने मन को समझाते रहे कि संभवत: यह बुढ़ौती की उँगलियों का फिसलना है।
इन घटनाओं और तमाम मूर्खताओं से गुज़रते हुए, हम अमीरों के रुपयों और शौक़ की तरह तेज़ी से ख़र्च होते रहे। मित्रों ने हमें निम्न-मध्यवर्गीय परिवार के गुल्लक के चिल्लर की तरह सहेजे रखा।
अब फ़िलहाल जौन एलिया साहब याद आ रहे—
मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
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समाप्त
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