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Rousseau

1712 - 1778

کی

अंतःकरण आत्मा की आवाज़ है, मनोवेग शरीर की आवाज़ हैं।

यथार्थता के जगत की अपनी सीमाएँ हैं; कल्पना का जगत असीम है। हम एक को बढ़ा नहीं सकते अतः हमें दूसरे को छोटा करना चाहिए, क्योंकि उनके अंतर से ही वे बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं जो हमें दुखी कर देती हैं।

बचपन विवेक की निद्रा है।

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