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शहीदों के मज़ारों पर लगेगें हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा।
क्या मेरे लिए इससे बढ़कर कोई इज़्ज़त हो सकती है। कि सबसे पहला और अव्वल मुसलमान हूँ जो आज़ादिये वतन की ख़ातिर फाँसी पा रहा है?
शहीदाने वतन का ख़ून इक दिन रंग लाएगा
चमन में फूट निकलेगा यह बरगे अर्गवाँ होकर।