संसार पर कवितांश
‘संसरति इति संसारः’—अर्थात
जो लगातार गतिशील है, वही संसार है। भारतीय चिंतनधारा में जीव, जगत और ब्रहम पर पर्याप्त विचार किया गया है। संसार का सामान्य अर्थ विश्व, इहलोक, जीवन का जंजाल, गृहस्थी, घर-संसार, दृश्य जगत आदि है। इस चयन में संसार और इसकी इहलीलाओं को विषय बनाती कविताओं का संकलन किया गया है।
मनुष्य का मोह
जिस-जिससे छूटेगा
वह उनसे होने वाले
दु:ख से सदा मुक्त रहेगा
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere