स्त्री इनके भीतर पर कविताएँ
स्त्री-केंद्रित पुरुष-रचित
हिन्दी कविताओं से एक चयन। यहाँ स्त्री केवल उपस्थिति नहीं, एक विषय है—अनुभूति में और संवाद में और सरोकार में। पुरुष कवि की दृष्टि उसे देखती है और खोजती है अपने भीतर और अपने समय में। इन कविताओं में स्त्री कभी आकृति बनकर उभरती है, कभी प्रश्न बनकर। यह चयन उन क्षणों का है, जहाँ शब्दों के बीच से ‘स्त्री’ का एक सजीव, स्पंदित बोध आकार ग्रहण करता है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere