रघुवीर सहाय का एक रूप आधुनिक मिज़ाज के प्रतिनिधि का है, दूसरा आधुनिकता के समीक्षक का।
जो रचना नहीं कर सकता, वह समीक्षा करता है।
जन्म के बाद से मनुष्य लगातार मृत्यु की तरफ बढ़ता रहता है। बीच के ये दो दिन ही उसके कर्म के होते हैं। यह कर्म वह किस तरह करता है, इसी पर उसका मूल्यांकन किया जाता है।
समीक्षा या समीक्षात्मक कसौटियाँ, अपने आप में विचार का काम भी करती हैं।
हम सभी कम या अधिक अभिमतों के दास हैं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere