गर्व पर उद्धरण
गर्व वैसे तो नकारात्मक
और सकारात्मक दोनों ही अर्थों में अहंभाव को प्रकट करता है, लेकिन प्रस्तुत संचयन में इसके विविध आयामों से गुज़रा जा सकता है।
एकमात्र गुण जिस पर मुझे गर्व है, वह मेरा स्वयं पर संदेह करना है; जब कोई लेखक इसे खो देता है, तब उसके द्वारा लिखना बंद कर देने का समय आ जाता है।
बिना पढ़े ही गर्व करने वाले, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मनोरथ करने वाले और बिना कर्म किए ही धन पाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को पंडित लोग मूर्ख कहते हैं।
गर्व का पतन निश्चित है।
अभिमानी व्यक्ति स्वयं को ही खा जाता है।
सत्ता का अभिमान, संपत्ति का अभिमान, बल का अभिमान, रूप का अभिमान, कुल का अभिमान, विद्वत्ता का अभिमान, अनुभव का अभिमान, कर्तव्य का अभिमान, चारित्र्य का अभिमान—ये अभिमान के नौ प्रकार हैं। पर मुझे अभिमान नहीं है, ऐसा भास होने जैसा भयानक अभिमान दूसरा नहीं है
यौवन के पूर्वकाल में हम अपनी कुवासनाओं के प्रदर्शन पर गर्व करते हैं, उत्तरकाल में अपने सद्गुणों के प्रदर्शन पर।
इस्लाम ने भारतीयता की स्थूलता को एक हज़ार वर्ष में छिन्न-भिन्न किया तो उसे ही सूक्ष्म स्तर पर पहले ईसाइयत ने और बाद में साम्यवादी-दर्शन ने गत पचास वर्षों में संपन्न किया।
ज़रा से जीर्ण रूपों को, रोग से क्षीण शरीरों को और काल से ग्रस्त आयु को देखकर किसे अभिमान हो सकता है!
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere