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विस्थापन पर गीत

अपनी जगहों को छोड़कर

दूसरी जगहों पर मजबूरन, जबरन या आदतन जाना युगों से मानवीय जीवन का हिस्सा रहा है; लेकिन निर्वासन या विस्थापन आधुनिक समय की सबसे बड़ी सचाइयों में से एक है। यह चयन उन कविताओं का है जिन्होंने निर्वासन या विस्थापन को अपने विषय के रूप में चुना है।

वह बोली, सावन आया है

ज्ञान प्रकाश आकुल

जनरल डब्बों में भर-भरकर

ज्ञान प्रकाश आकुल

अम्मा थोड़ा हाल बताना

ज्ञान प्रकाश आकुल

बसाबह गाम अप्पन

मार्कण्डेय प्रवासी

कबले अइबऽ शहरिया से

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

गाँव नीक बा

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

ना अइलऽ बरिसात में

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

बरगदवा बोलावेला

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

पठवले बानी पतिया

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

गामे मोन पड़ैए

कालीकान्त झा ‘बूच’

लाल सिनूर

शान्ति सुमन

सोन दाइ

कालीकान्त झा ‘बूच’

ई मैथिलीक नमस्कार छथि

मार्कण्डेय प्रवासी

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere