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कुंठा पर उद्धरण

कुंठा मानसिक ग्रंथि

अथवा निराशाजन्य अतृप्त भावना या ‘फ़्रस्ट्रेशन’ है। स्वयं पर आरोप में यह ग्लानि या अपराध-बोध और अन्य पर दोषारोपण में ईर्ष्या या चिढ़ का द्योतक भी हो सकता है। मन के इस भाव को—इसके विभिन्न अर्थों में कविता अभिव्यक्त करती रही है।

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जब किसी की निंदा का विचार मन में उठे तो जानना कि तुम भी उसी ज्वर से ग्रस्त हो रहे हो। स्वस्थ व्यक्ति कभी किसी की निंदा में संलग्न नहीं होता।

ओशो
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शरीर से बीमार ही नहीं, मन से बीमार भी दया के पात्र हैं।

ओशो
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सच तो यह है कि ऐसी योग्यता; जिसमें महान प्रेरणा हो, जिसमें लोक-कल्याण के लिए त्याग की भावना हो, जिसमें जन-जीवन की अंतर्धाराओं को देखने की दृष्टि हो—ऐसी योग्यता निरर्थक है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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